कुछ दिनों पहले समुन्दर किनारे से प्लास्टिक बोतलें बीन के माननीय प्रधानमंत्रीजी ने मिसाल कायम की थी. इस विषय पर काफी वाद-प्रतिवाद भी हुआ. इस विषय के पक्ष में कहने वाले इसे एक बेमिसाल उदाहरण मानते हैं और तर्क प्रस्तुत करते हैं की अगर प्रधानमंत्रीजी ने नाटक किया तो देश को स्वच्छ बनाने के लिए आप भी रोज़ एक घंटे नाटक कीजिये.
जी, बिलकुल करने को तैयार हूँ. लेकिन क्या कोई प्रकाश डालेगा कि हिन्दुस्तान का कौन सा शहर अपशिष्ट प्रबंधन (waste management) में स्वयंपर्याप्त (self sufficient) है. हर शहर में टनों प्लास्टिक अपशिष्ट प्रतिदिन जमा होते हैं. इन कचरों को उन जगहों से तो साफ़ कर दिया जाता है जहाँ स्वयं को संभ्रांत कहनेवाले लोग रहते हैं. और इन कचरों को धकेला जाता है उन झुग्गी झोपड़ियों के पास जहाँ समाज का निचला तबका रहता है. ना किसी को इस बात की चिंता है कि कैसे दुर्गन्धपूर्ण वातावरण में उनका जीवन यापन होता है, ना किसी को इस बात की फिकर कि इन कचरों की वजह से कैसी कैसी बीमारियों से उन इंसानों को और उनके बच्चों को जूझना पड़ता है.
बचपन से हमें सिखाया गया की स्वच्छता हज़ार नियामत है. ईश्वर की कृपा से हम में से कई लोगों को ऐसा जीवन मिला कि संभ्रांत एवं स्वच्छ इलाकों में ज़िन्दगी गुज़र रही है. मगर उन लोगों का क्या जो गरीब हैं, जो झुग्गी झोपड़ियों में जीवन बसर करते हैं. क्या वे भारतीय नागरिक नहीं हैं? क्या उनके जीवन में स्वच्छता का अधिकार नहीं है?
मैं मानता हूँ कि स्वच्छता कि पहल के रूप में वर्त्तमान सरकार ने शौचालयों का निर्माण किया है. मगर अपशिष्ट प्रबंधन में आज भी सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा सकी है. किसी भी शहर के नगरपालिका या पंचायत के पास इस बात की कोई कारगर जानकारी नहीं है कि उनके शहर या गाँव में एक दिन में कितने टन अपशिष्ट बनते हैं, कितने टन को प्रोसेस करके ख़तम किया जा सकता है.
एक सरल उदाहरण प्रस्तुत करूँगा. अगर आप एक बच्चे को फुटबाल खिलाड़ी बनाना चाहते हों और सिर्फ उसे महान खिलाड़ी बनाने के लिए दो कदम लेते हो. एक :- उसे एक फ़ुटबाल खरीद कर देते हो. दो :- उसे टीवी पर मेस्सी और रोनाल्डो के खेल दिखवाते हो. फिर अगर आप ये सपना देख रहे हो कि वो बच्चा एक दिन महान खिलाड़ी बनेगा तो ये सिर्फ सपना ही बन के रह जाएगा. बच्चे की खिलाड़ी बनाने के लिए और भी बहुत चीज़ें चाहिए. एक मैदान चाहिए खेलने के लिए, 21 साथी खिलाड़ी चाहिए, एक प्रशिक्षक चाहिए, वक्त चाहिए, प्रोटीनयुक्त भोजन चाहिए, उसे मुकाबलों का अनुभव मिले ऐसी व्यवस्था चाहिए.
आइये इसी उदाहरण को अब उपरोक्त विषय के साथ मिलाकर देखें. भारत को स्वच्छ बनाना है तो सिर्फ अखबारों का विज्ञापन या केमरे के आगे किया गया अभिनय काफी नहीं होगा. इसके लिए कई कठोर एवं सक्षम कदम उठाने की ज़रुरत है. मेरी अल्पबुध्धि में जो विचार आ रहे हैं, उसे प्रस्तुत कर रहा हूँ :-
1. सर्वप्रथम देश में सभी राज्यों को एक समान रूप से बाधक एक “प्लास्टिक नियम” की आवश्यकता है. प्लास्टिक के उपयोग में रोक, खाद्य वस्तुओं को प्लास्टिक से दूर रखने के कारगर उपाय, प्लास्टिक के जगह अन्य वस्तुओं का विकल्प आदि पर सभी राज्यों को सामान रूप से निर्देश दिए जाने चाहिए.
2. देश के सभी जिलों में एक “अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र” (Waste Management Centre) होना चाहिए. सारे जिले का कचरा इस केंद्र में आने के बाद जैविक और अजैविक कचरे में तब्दील कर इसे पूर्ण रूप से ख़तम करने की प्रक्रिया की रूप रेखा बननी चाहिए. हर गली में बड़ा कूड़ेदान और उस कूड़ेदान को नियमित रूप से साफ़ करने के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए. अलग से कहने की ज़रुरत नहीं कि सुव्यवस्थित रूप से अगर किया जाए तो ये प्रक्रिया भारी मात्र में रोज़गार भी पैदा करेगी.
3. सभी बड़ी कंपनियों को ताकीद दी जाए कि अपने उत्पन्नों को प्लास्टिक में लपेट के बेचने की जगह वैकल्पिक व्यवस्था का प्रावधान करें. फिर भी प्लास्टिक में लपेट के सामान बेचनेवालों के ऊपर 200% अतिरिक्त कर लगाया जाए. सामान जब महंगे होंगे तो लोग अपने आप ही उसके उपयोगों से दूर होंगे.
4. हर सब्जी की दूकान , कसाई की दूकान आदि को लायसेंस देने के पहले इस बात की कड़ी जांच की जाए की वो अपना कचरा किस तरह प्रोसेस करते हैं. क्या उन्होंने बायो प्लांट लगाया है. अगर वो इस काम में नगरपालिका का सहयोग चाहते हैं तो उन पर अलग से कर लगाया जाए.
4. और उपरोक्त सभी व्यवस्था करने के बाद आम जनता को भी क़ानून के दायरे में लाया जाए. स्कूल के बच्चों से लेकर आफिस के साहबजादे तक कपडे की थैलियों को लेकर चलने के लिए प्रेरित किया जाए. क़ानून के बनने के बाद सख्त जुर्माने की व्यवस्था की जाए. आज हालात ये हैं कि आम जनता को तो आप उपदेश दे रहे हो कि स्वच्छता बनाएँ, लेकिन बाजारों में प्लास्टिक उत्पाद धड़ल्ले से बिक रहे हैं. जनता को आप विकल्प नहीं दे रहे हो और जनता से उम्मीद है कि स्वच्छता बनाएँ.
अगर ऊपर कही गए बातों को सख्ती से किया जाए तो मजाल है की देश फिर स्वच्छ ना रहे.
जनाब फ़ुटबाल खेलना चाहता हूँ, मुझे मैदान तो दीजिये.
समुन्दर किनारे से प्लास्टिक बोतल उठाकर बड़ी काली प्लास्टिक थैली में डाला, बड़ी प्लास्टिक थैली को उस होटल के कूड़ेदान में डाला, नगरपालिका के गाडी ने वहां से कूड़ेदान को उठाकर शहर के दूसरे तरफ बने झुग्गी झोपड़ियों के पास बने मैदान में डाला................. अब वहाँ से आगे क्या? क्या भारत वाकई स्वच्छ हो गया? क्या वो प्लास्टिक के बोतल हमारे पावन धरती से हमेशा के लिए ख़तम हो गए? यहाँ कचरे का संस्करण तो हो नहीं रहा है. बस, कचरे को एक जगह से उठाकर दूसरे जगह छुपाया जा रहा है. क्या यही स्वच्छता के मानदंड हैं?
नहीं जनाब. आप जिस पद पर बैठे हैं, आपका काम कचरा उठाना नहीं है. आप हमें व्यवस्था दीजिये, इन कचरों को हमेशा के लिए ख़त्म करने का मार्गदर्शन दीजिये, इन्फ्रास्ट्रक्चर दीजिये, सख्त नियम बनाइये और हम देश के नागरिक साबित करेंगे कि “हम किसी से कम नहीं”
जय हिन्द!!!
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