02 अक्टूबर 2017

भारत में राजनीति के आयाम

स्वतन्त्रता के बाद से भारतीय राजनीति सदैव उथल-पुथल युक्त ही रही. इसका सबसे बड़ा कारण भारतीय जनता की अज्ञानता ही रही है. अशिक्षित भारतीय जनता ने सदैव से अपने नेताओं को ईश्वर के रूप में देखा. स्वतंत्रता के पहले से ही इस बात का फायदा उठाकर मक्कारों ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली थी. ऐसा कभी नहीं था कि काँग्रेस खराब थी. जितना इतिहास हमने पढ़ा है और समझा है, उस से यही लगता है कि आज़ादी कि लड़ाई में कांग्रेस का बहुत ही बड़ा योगदान रहा. लेकिन, जहाँ एक ओर निःस्वार्थ नेता आज़ादी की जंग लड़ रहे थे, वहीँ मक्कारों और चालबाजों की टोली ने अंग्रेजों के साथ मिली-भगत से सत्ता पाने का षडयंत्र रच लिया था. और अंत में मक्कारों की ही जीत हुई. 15 अगस्त 1947 को सत्ता चाटुकारों ने हड़प ली. सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे सच्चे देश-सेवकों को किनारा करते हुए अपने मतलब की खातिर देश का बंटवारा कर दिया गया और धर्म के नाम पे एक ऐसा ज़हरीला बीज बोया गया जो आज 70 साल बाद भी हमें एक “विकासशील” देश बनाए हुए है , ना कि एक “विकसित” देश.
आजकल सोशिअल मीडिया में रहते हुए दिन भर दोस्तों की लड़ाई देखने का अवसर प्राप्त होता है. कोई श्री मोदीजी के तारीफ़ के पुल बांधता है तो कोई उसके विरोध में तर्क प्रस्तुत करता है. कोई दिन में कई-कई बार हिंदुत्व का हुंकार भरता है तो कोई बार-बार दावा ठोकता है कि देश का मुसलमान खतरे में है. कोई सवाल उठाता है कि 70 साल में देश ने क्या प्रगति की तो कोई उम्मीद जताता है कि आने वाले 20 साल में भारत विश्व की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा.
अगर ध्यान से देखा जाए तो आम भारतीय जनता राजनीतिज्ञों के दोगलेपन का शिकार है, चाहे पार्टी कोई भी हो. ये कहना मजबूरी बन जाती है कि किसी भी पार्टी ने देश के विकास को अपने विकास से ऊपर नहीं रखा. जब भी, जो भी पार्टी शासन में आयी उन्होंने देश के विकास की बजाय व्यक्तिगत विकास पर ही जोर दिया. काँग्रेस देश का कोढ़ थी जिसने गांधी परिवार को इस देश का सर्वस्व बना दिया. एक विदेशी महिला ने इसी बात का फायदा उठाकर कठपुतली सरकार चलाकर देश को जी भरकर लूटा-खसोटा.
इस लूट-खसोट से तंग आकर देश की जनता ने श्री मोदीजी को देश की बागडोर थमाई. यहाँ ये बात साफ़ है कि भारतीय जनता पार्टी पर देश की जनता को कोई विश्वास नहीं था. अगर 2014 का चुनाव बीजेपी आडवाणीजी के नेतृत्व में लडती तो चारों खाने चित्त रहती. एक व्यक्ति विशेष के क्षमता पर लोगों ने अपना विश्वास अर्पित किया. मगर 3 साल बाद जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है. विकास के नाम पर देश की संपूर्ण व्यवस्था में उथल-पुथल मचा दिया गया है. कुछ ऐसी परिभाषायें ला दी गयी हैं जिसके तहत कोई भी सवाल नहीं उठा सकता है. श्री मोदीजी को देश का रक्षक और देश-प्रेम की तस्वीर बना दी गयी है. कुछ ऐसा माहौल है कि आप सरकार की नीतियों पर सवाल करो तो आप देश-द्रोही बन जाते हो. वाह भाई वाह.
4 साल पहले, बीजेपी ने उस समय की सरकार पे आरोप लगाया था कि पेट्रोल और गैस के दाम के कारण आम जनता का जीवन दुभर हो गया है. उस समय अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर थी. आज जब कच्चे तेल की कीमत 54 डॉलर हो गयी है तब भी सरकार उसी दाम पर पेट्रोल बेच के भारी बचत कर रही है. मगर अब दावा ये है कि ये सब देश के विकास के लिए हो रहा है. भाई मेरे, उस समय भी सरकार देश के “विकास” के लिए ही तेल महंगे दामों में बेच रही थी. बीजेपी ने 4 साल पहले पेट्रोल के बढे हुए दामों का विरोध किया , आधार का विरोध किया, GST का विरोध किया और सत्ता में आते ही इन्हीं सभी चीज़ों को देश के विकास का स्त्रोत बताया. तो पहले ही बता देते हुज़ूर. ये दोगलापन क्यों? समर्थकों द्वारा तर्क पे तर्क दिए जाते हैं कि देश का भारी-भरकम विकास हो रहा है. सत्य है. हो भी रहा होगा. लेकिन प्रत्यक्ष में तो बीजेपी की नीतियों से अम्बानीयों और अदानियों का ही फायदा दिखता है. दावा पेश किया जाता है कि इस सरकार ने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया लेकिन पहले ही बजट में 20000 करोड़ रुपये गंगा की सफाई के लिए रख दिए गए. आध्यात्म एवं धर्म को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान देनेवाले भारतीयों को बेवकूफ बनाने का इस से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है? गंगा आज भी मैली है और कोई नहीं जानता कि 20000 करोड़ रुपयों से गंगा कितनी साफ़ हुई. नोट-बंदी से देश का कितना भला हुआ ये तो आनेवाला वक्त बतायेगा, लेकिन आम जनता को इतना तो समझ में आ ही गया कि नोट-बंदी का उद्देश्य देश की भलाई तो बिलकुल नहीं था बल्कि यू. पी. का चुनाव जीतना था.
ये सब लिखने का तात्पर्य ना तो मोदी विरुद्धता है और ना ही काँग्रेस का समर्थन. ये सब लिखने का एक ही तात्पर्य है कि दिन भर अपने ही दोस्तों को अलग-अलग दल बनाकर एक दुसरे से बहस करते हुए देखना पड़ता है. यारों, कम से कम अब भी समझ जाओ की इन राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य देश की भलाई कभी ना रही ना रहेगी. अगर किसी दिन ऐसी कोई पार्टी का शासन आ जाए तो विकास के लिए कभी 25 साल इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. जो पार्टी आते ही “आरक्षण” को हटा दे , समझ लेना वही इस देश में वास्तविक विकास लाने जा रही है (असंभव , असंभव ). वरना बाकी सब तो हम सबको अलग-अलग टोपी पहनाकर अपना उल्लू सीधा करेगी. कभी देश-प्रेम की टोपी, कभी विकास की टोपी, कभी धरम की टोपी.
हाँ अंत में एक और बात. जिस हिसाब से सब कुछ चल रहा है, इस बात में कोई शक नहीं कि अगला चुनाव भी श्री मोदीजी ही जीतेंगे. वो इसलिए नहीं होगा कि उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया, बल्कि इसलिए होगा कि भ्रष्टाचार की पराकाष्टा के चलते अब विपक्ष में ऐसा कोई नेता नहीं बचा जिस पे जनता अपना विश्वास अर्पित कर सके.
अब जब जुमलों की ही सरकार चल रही है तो हम भी इस जुमले के सहारे बैठे हैं कि “उम्मीद पे दुनियां कायम है “ . जय हिन्द.

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – 4)

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