ये कहानी दास दादा की है . AK दास दादा की नहीं है, गाडी चलाने वाले सिंगर सर डैश दादा की भी नहीं है, PK दास दादा की भी नहीं है. उस ज़माने में हैंड्स काल के बाद ब्रोडकास्ट पे अनूप जलोटा की भजन बजते थे. उस में पूछा जाता था “जल से पतला कौन है, कौन भूमि से भारी ?” और सीनियर लोग एक सुर में कहते थे “जल से पतला दास है, और दास भूमि से भारी”. तो ये कहानी है उन दूसरे दास दादा कि जो ज़रा से भारी थे. भारी बस इतने थे कि जब हैच से उतरते थे तो पहले उनका पेट आता था , फिर करीब 5 मिनिट के बाद उनके दर्शन होते थे . ये कहानी उनके इस अनोखे पेट से जुडी हुई है.
दास दादा अपने आप में एक बहुमुखी प्रतिभा थे. उनका चाल में, उनकी हर अदा में एक रहस्य छुपा हुआ था. अगर किंवदंतियों को सच माना जाए तो दास दादा बताते हैं कि वो बॉर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स में रह चुके थे और कई दुश्मनों को युद्ध भूमि में मार चुके हैं. शिप में जब आर्म्स फायरिंग वगैरा होता था तो दास दादा उसमें भाग नहीं लेते . एक बार मैंने पुछा तो बताया कि मैं LMG से नीचे किसी गन को नहीं चलाता. वैसे वो होमियो के भी प्रेक्टीशनर थे. उनके पास सदैव दवाइयों की एक पोटली हुआ करती थी. शिप के मेडिकल ऑफिसर के साथ – साथ सतलज 45 मेन मेस में दादू की प्रायवेट प्रेक्टीस चला करती थी. उसके चलते उनका एक निक नेम “दवाई दादू “ भी था.
एक बार बख्शी सर दवाई दादू के पास सिक परेड चले गए. उन दिनों बख्शी सर शिप के डैवरों के सरदार थे. जब भी जहाज में क्लियर लोवर डेक होता था बख्शी सर और उनकी पूरी टोली ऑक्सीजन सिलेंडर टांग के जहाज का प्रोपेलर चेक करने गोता मार देते थे . फिर क्लियर लोवर डेक ख़तम होने के बाद ही उनके दर्शन होते थे. अगर प्रोपेलर चेकिंग का गिनेस रिकोर्ड होता तो सतलज के प्रोपेलर को “The Most Checked Propeller” का गिनेस रिकोर्ड मिलता . मधु-मुनक्का का स्टोक कभी भी बख्शी सर के पास ख़त्म नहीं होता था . तो बात चल रही थी सिक परेड की. बख्शी सर घुसे दवाई दादू के केबिन में . नाचीज़ वहां खड़ा-खड़ा ब्रासो कर रिया था. दवाई दादू ने पहले बख्शी सर को पालथी मार कर लोवर बंक में बैठने को कहा . फिर उन्होंने अपनी पोटली निकालकर ताम-तबेला फैला दिया . उसके बाद आँखें बंद करके प्रार्थना की. फिर उन्होंने बख्शी सर का नब्ज़ देखा. उसके बाद गंभीर मुद्रा में प्रश्न किया “ बख्शी , तुम्हारे घर में कुछ प्रोब्लम है क्या ?” बख्शी सर ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से कुछ देर दादू को घूरा . फिर तेजी से उठ के भाग लिए . मैं पीछे पीछे गया और पुछा , “सर , क्या हुआ?” बख्शी सर गुस्से की अधिकता में हलके से तोतला बैठते थे . बोले, “थाला मैं थर दर्द का दवाई लेने गया और वो पूछता है कि घर में कुछ प्रॉब्लम है क्या?”. वैसे बख्शी सर का डर भी वाजिब था क्योंकि 2 दिन पहले ही एक लीडिंग कुक घर में प्रॉब्लम है बोलकर मेंटल केस में संजीवनी में एडमिट हुआ था . खैर ये घटना मूल कथा से हट के है. इसका उल्लेख सिर्फ दवाई दादू की मल्टीटेलेंटेड पर्सनाल्टी से आपको अवगत कराना था .
ये तो हुई सतलज में दवाई दादू के कारनामों की हलकी सी झलक. फिर आया 1994. हम पहुंचे हाइड्रो स्कूल SR-2 करने. दादू भी आये हुए थे SR-1 करने. उस ज़माने की बड़ी बड़ी हस्तियाँ बनवारी लाल सर, खेता राम सर, भट्टी सर, वेदप्रकाश कंडोला सर वगैरा SR-1 क्लास में थे. तो एक शनिवार की शाम को दादा गए लिबर्टी. देर रात करीब 12 बजे लिबर्टी से दादा वापस लौटे. उन दिनों डोरमेट्री में लाईट ऑफ होने के बाद बन्दे लोग बाहर बैठ के टास्क-बुक लिखा करते थे . अचानक से एक आवाज़ सुनकर जब हमने दाहिने देख किया तो देखा कि दादा लुढ़कते हुए ब्लोक की तरफ आ रहे हैं. उनका अंदाज़ बयान कर रहा था कि वो फुल टल्ली हैं. हम लोगों ने उठ के सहारा देना चाहा मगर दादा ने पॉइंट ब्लेंक पे हमें मना कर दिया . ज़ल्दी से कपडा वगैरा खोल के उन्होंने अपना बंगाली गमछा लपेटा . फूर्ती के साथ , बेख़ौफ़ अंदाज़ में वो बाथरूम की तरफ गए . रास्ते में हमको देखकर बोले, “आज तो मज़ा आ गया .”
दादा का कोंफिडेंस देखकर हम लोगों को भी तसल्ली हुई. हम वापस टास्क-बुक में “हेलियोग्राफ” का चेप्टर कम्प्लीट करने लगे जो कि मास्टर चीफ वेदप्रकाश सर पढ़ाया करते थे. थोड़े देर के बाद दादा उसी कोंफीडेंस के साथ SR-1 ब्लोक की तरफ गए. अचानक जोर से “धम्म” की आवाज़ सुनाई दी . जैसे किसी ट्रक से चावल का बोरा ज़मीन पे गिरा हो . हम दौड़ के गया तो नज़ारा बहुत ही अद्भुत था . दोनों हाथों को कंधे से 180 डिग्री के एंगल पर और दोनों टांगों के बीच 60 डिग्री का एंगल बनाकर दवाई दादू फर्श पे पसरे हुए थे . उनकी आँखें ध्यान-मुद्रा में बंद थी और चेहरे पर असीम शान्ति थी. इसके पहले की हम उनको सहारा देकर उठाते , उनके मुख से शाम की दारु, चखना और फोलोड बाय जो डीनर था वो फव्वारे के रूप में निकल पड़ा . बहुत ही अद्भुत दृश्य था. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के चलते वो फव्वारा वापस उनके मुखमंडल को शोभित करता हुआ फर्श पर ऑस्ट्रेलिया का नक्शा बना बैठा . अब उनको छूना मुश्किल था . उन दिनों हाइड्रो स्कूल में पानी की बड़ी किल्लत थी. अगर दादू की हेल्प करते तो हाथ धोने के लाले पड जाते. तब तक राकेश सर (लाला सर के नाम से मशहूर थे) आये. उन्होंने स्थिति का जायजा लिया और कहा कि “इसे ऐसा ही पड़े रहने दो.” बस सारे वहां से बिखर गए. दरवाजे के आसपास के बिस्तर वाले दुर्गन्ध के चलते उठ उठ के बाहर भाग लिए. लेकिन दादा प्रसन्नचित होकर स्वप्नलोक में विचरण कर रहे थे.
रात के करीब 1 बजे वेदप्रकाश कंडोला सर लिबर्टी से वापस आये. उन्होंने इस नज़ारे को देखने के बाद पूरी स्थिति का जायजा लिया. फिर तेज़ आवाज में उन्होंने कहा , “ ओये.... कोई इसके पेट पे लिख दो , टेंक कलींड ओन 30 अक्टूबर 1994.” पूरा डोरमेट्री ठहाकों की आवाज़ से गूँज उठा मगर दवाई दादू के खर्राटे बेफिक्री से बजे जा रहे थे.
उपसंहार : अगली सुबह दादू ने डोरमेट्री को बड़ी तन्मयता से साफ़ किया . उनके प्रकोप के भय से उनके सामने किसी ने भी इस घटना का उल्लेख नहीं किया. मगर इस घटना के बाद उनके पेट को एक नया प्यारा सा दुलारा सा नाम मिला “टेंक” जो कि कलींड था.
(समाप्त)
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