कार्तिक माह की
अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है. अहंकारी लंकापति रावण के वध के
पश्चात् जब भगवान् श्रीराम अयोध्या लौटे तो वहां के निवासियों ने दीप जलाकर उनका
स्वागत किया था. दीपावली का त्यौहार 5 दिनों
में मनाया जाता है, ये हैं : धन तेरस, नरक चौदस, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और
भाई दूज. ये वो बातें हैं जो मास्टरजी ने हमें कक्षा दूसरी या तीसरी में पढाया था.
हमारे लिए बचपन की
दीपावली आज भी जीवन के सबसे मधुर यादों में से है. उन दिनों दशहरा-दीपावली के लिए
लगभग 40 दिनों की छुट्टियाँ हुआ करती थी. छुट्टियाँ लगभग
दशहरे के भी 12 दिन पहले शुरू हुआ करती थी. शाला के अंतिम दिनों
में सारे मास्टर लोग छुट्टियों का गृह-कार्य लिखवाया करते थे. फिर शुरू होते थे
साल के बेहतरीन दिन. सारे दिन मस्ती करो और रात को 6 नम्बर स्कूल के मैदान में रामलीला देखने के लिए पहुँच जाओ. वैसे तो
बच्चों का हुजूम शाम से ही मैदान में पहुँच जाता था. फिर वहां पर मैदान में बोरी
बिछाकर रात के लिए सीट बुक किया जाता था. रात को खाना खाने के बाद कम से कम आधा
दल्ली-राजहरा उस मैदान में जमा हो जाता था. हर साल एक नयी रामलीला मण्डली आकर हमें
रामायण का ज्ञान करवाती थी. एक बार लक्ष्मणजी ने शूर्पणखा की नाक काट दी तो हमें
काफी दुःख हुआ. शूर्पणखा के नाक का हाल जानने के लिए अपने भाई साहेब के साथ दबे-पाँव
स्टेज के पीछे पहुंचा. छुप के देखा तो “शूर्पणखा” एक टेबल के ऊपर बैठ कर बीडी पी
रही थी (था). सीन देखकर हमारी हंसी छूट गयी और शूर्पणखा को हमारे उपस्थिति का
एहसास हो गया. “कौन है बे?” की पुकार के साथ उसने डंडा उठाकर फेंका और हम वहां से
भाग खड़े हुए. खैर, रामलीला हमने कभी भी नहीं छोड़ा.
दशहरे के दिन दल्ली
स्टेडियम में रावण के पुतले को जलाया जाता था. उसके पहले सारे शहर में जुलूस
निकाला जाता था. जब रावण को जलाकर लौटते थे तो पहली बार ठण्ड का एहसास होता था. वो
सर्दियों के दिन प्रारम्भ होने की सूचना हुआ करती थी. फिर डब्बों में बंद स्वेटर
और कम्बल बाहर आने लग जाते थे. दीपावली के लिए सभी घरों में सफाई शुरू हो जाती थी.
उन दिनों जीवन में प्लास्टिक का उपयोग होता ही नहीं था. जब शाम को सूखे कचरे को
जलाया जाता था, उसमें से भी भीनी-भीनी खुशबु ही आया करती थी. सारे बच्चे आग के
इर्द-गिर्द जमा हो कुछ न कुछ खुरापात में लग जाते थे. सभी घरों में माताएँ दीपावली
के पकवान बनाने में व्यस्त हो जाया करते थे. नए कपड़ों, दिया-बाती और पटाखों की
खरीदारी भी साथ के साथ चालु रहती थी. मुख्य पटाखों को लक्ष्मी पूजा के लिए बचा के
रखा जाता था. दशहरे के बाद से ही हम सब टिकली पटाखे और उसको फोड़नेवाली पिस्तौल के
साथ चोर-पुलिस का खेल शुरू कर दिया करते थे. जिनके पास पिस्तौल नहीं होती थी वो
टिकली पटाखे या तो पत्थर से फोड़ते थे या फिर दीवाल में घिस के फोड़ते थे. इस सिलसिले
में एक और किस्सा याद आता है, 1987 या 88 में सर्कस ग्राउंड में फटाखों की दूकान में भीषण आग लगी थी जिस में
काफी नुकसान हुआ था.
धन-तेरस आते आते
सारे घर सज-धज के तैयार हो जाते थे. कई घरों में रंगीन कंदीलें लटकाई जाती थी. बाकी
घरों में दिए जलाए जाते थे. शाम होते-होते लक्ष्मी पूजन की समाप्ति होती थी, फिर
पटाखों की बारी आती थी. लक्ष्मी-बम, एटम-बम, चिटपटरी-बम, अनारदाना, सुरसुरी (बाद
में पता चला की उसे फुलझड़ी भी कहते हैं :-P), चकरी, राकेट और सांप.... ना जाने
कितने किस्म के फटाखों को फोड़ा जाता था. कुछ लोगों के पटाखे जल्दी ख़तम हो जाते थे
और कुछ के देर रात तक चलते थे. जिनके ख़तम हो जाते थे वो दूसरों के पटाखे देखकर मायूस
हो के बैठे रहते थे. कसम से अगर भगवान् उस समय प्रकट होते और वर मांगने को कहते तो
10 लक्ष्मी-बम और 5 चिटपटरी से ज्यादा कुछ और नहीं मांगते. और फिर अगली सुबह फूटे पटाखों के बीच में से बिना फूटे पटाखों को ढूँढ
के जमा करते थे, जिन्हें बकायदा धुप में सुखाकर फिर से फोड़ा जाता था.
लक्ष्मी-पूजा की रात
को फिर घर पे बने हुए पकवानों का आदान-प्रदान होता था. एक स्ट्रीट में 20-22 परिवार होते थे और सबके पकवान एक दुसरे के घरों में जाते थे. अगले दिन
गोवर्धन–पूजा के उपलक्ष्य में गाय के साथ राउत लोग आते थे और उन सभी घरों के सामने
“राउत-नाचा” करते थे जहां गाय पाली जाती थी. फिर भाई-दूज के साथ दीपावली की
समाप्ति हो जाती थी. फिर से पाठशालाएं खुल जाती थी और हम अपने जीवन में व्यस्त हो
जाते थे, अगली दीपावली के इंतज़ार में.
दल्ली-राजहरा में
रहते हुए कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि दीपावली सिर्फ हिन्दुओं का त्यौहार है. हमारे
लिए तो ये सबका त्यौहार हुआ करता था. हम भी नए कपडे पहनते थे, हमारे घर भी सजते
थे, हम भी पटाखे चलाते थे और सभी दोस्तों के साथ खुशियाँ मनाते थे. वक्त ने ना
जाने कब इंसानियत के तालाब में ज़हर घोल दिया और त्योहारों का भी बंटवारा हो गया.
लेकिन मुझे पूरा
यकीन है कि दल्ली-राजहरा में जिसने बचपन में दीपावली मनाई हो, वो किसी भी धर्म या
जाति का हो, दुनिया के किसी भी कोने में हो, दीपावली की खुशियों से अपने आप को दूर
नहीं रख सकता.
बुराई पर भलाई के
जीत के इस पावन पर्व पर सभी दल्ली निवासियों और अपने प्रिय मित्रों एवं उनके
परिवारजनों को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएँ.