अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक मुझे यही लगता है कि मेरा जन्म “दल्ली-राजहरा” में हुआ. आज लगभग 25 साल हो चुके हैं उस शहर को अलविदा कहे हुए, लेकिन ऐसा लगता है कि सिर्फ मेरा शरीर ही वहाँ से निकल पाया. मेरी आत्मा आज भी उस शहर के गलियों और चौबारों में भटक रही है.
1972 में दल्ली-राजहरा के बी.एस.पी. अस्पताल में मेरा जन्म हुआ. 1978 में बी. एस.पी. शाला क्रमांक 6 में शिक्षा का प्रारम्भ हुआ. साहू सर, ठाकुर मेडम ये आज भी यादों में छाए हुए हैं. फिर शाला क्रमांक 2 में उच्चशिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1990 में मैंने भारतीय नौ-सेना ज्वाइन कर ली. तब से ज़िन्दगी इतनी भाग-दौड़ भरी हो गयी कि फिर से उस मिट्टी को छूने की तमन्ना बस तमन्ना बनकर ही रह गयी.
मैं आभारी हूँ उन सभी शिक्षकों का, जिन्होंने मुझे जीवन के अनमोल पाठ पढाये. भौतिक विज्ञान के चंद्राकर सर, संस्कृत के सोनवानी सर, हिंदी के उदयराम साहू सर, केमिस्ट्री वाले तिवारी सर, इंग्लिश के वर्याम सर और भी अनगिनत शिक्षकों ने जीवन को दिशा देने में भारी योगदान दिया.
दल्ली की सुनहरी यादों में वार्षिक फुटबॉल टूर्नामेंट भी हुआ करता था जिसका की हर दल्लीवासी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता था. दशहरा के पहले 6 नम्बर स्कूल के मैदान में होनेवाली रामलीला को देखने के लिए शाम को 4 बजे ही हम बोरी बिछा के तैयार हो जाया करते थे. आशा टाकीज़ में आनेवाली हर नयी फिल्म का ऐलान अमीन सायनी के तर्ज़ पर रिक्शा में माइक लगाकर किया जाता था. गणेश पूजा के दौरान हर स्ट्रीट में एक कमेटी बनती थी और गणेश बिठाया जाता था. पंडरदल्ली के क्लब के पास सप्ताह में एक दिन ओपन एयर फिल्म शो हुआ करता था, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे. तब शहर में टी.वी. का चलन शुरू नहीं हुआ था.
31 अक्तूबर 1984 को पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिराजी की निर्मम हत्या के बाद सारे भारत में दंगे भड़क उठे थे. लेकिन हमारा शहर शान्ति और भाईचारे का प्रतीक बना हुआ था. इंदिराजी की अंतिम यात्रा के दर्शन के लिए “राठौर ब्रदर्स” की दूकान से काफी टीवी बिके थे. तब छतों के ऊपर लम्बे एंटीना को लगाने के बाद रायपुर दूरदर्शन के दर्शन होते थे. फिर एक-दो साल में दल्ली में भी टी.वी. रिले सेंटर आ गया. उस दौरान रेलवेओवरब्रिज से पहले महावीर टाकीज़ का उद्घाटन हुआ जहाँ जैकीश्राफ की “हीरो” फिल्म रिलीज़ हुई थी.
सप्तागिरी पार्क की शामें, राजहरा बाबा मंदिर की शान्ति, बोरडी डैम की यात्रा, दल्ली और उससे लगे हुए प्रदेशों की सुन्दरता, ऐसा अनुभव फिर जीवन में कहीं नहीं मिला. इस यादों के सफ़र से गुजरने वाले हर पुराने साथियों को वो हसीन दिन ज़रूर याद आयेंगे. ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि अपने जीवन के सफ़र में मुझे फिर से दल्ली दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो.
--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.
2 टिप्पणियां:
Superb Jimmy George. I never knew that you still write so perfect Hindi. Heart touching blogs. I am reading one by one all of them.
Kudos to you. Keep it up.
दल्ली के बारे में पढ़ कर सुनकर दिल रोमांचित हो जाता है।
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