12 नवंबर 2015

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 3 बचपन की दीपावली)

कार्तिक माह की अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है. अहंकारी लंकापति रावण के वध के पश्चात् जब भगवान् श्रीराम अयोध्या लौटे तो वहां के निवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था. दीपावली का त्यौहार 5 दिनों में मनाया जाता है, ये हैं : धन तेरस, नरक चौदस, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज. ये वो बातें हैं जो मास्टरजी ने हमें कक्षा दूसरी या तीसरी में पढाया था.

हमारे लिए बचपन की दीपावली आज भी जीवन के सबसे मधुर यादों में से है. उन दिनों दशहरा-दीपावली के लिए लगभग 40 दिनों की छुट्टियाँ हुआ करती थी. छुट्टियाँ लगभग दशहरे के भी 12 दिन पहले शुरू हुआ करती थी. शाला के अंतिम दिनों में सारे मास्टर लोग छुट्टियों का गृह-कार्य लिखवाया करते थे. फिर शुरू होते थे साल के बेहतरीन दिन. सारे दिन मस्ती करो और रात को 6 नम्बर स्कूल के मैदान में रामलीला देखने के लिए पहुँच जाओ. वैसे तो बच्चों का हुजूम शाम से ही मैदान में पहुँच जाता था. फिर वहां पर मैदान में बोरी बिछाकर रात के लिए सीट बुक किया जाता था. रात को खाना खाने के बाद कम से कम आधा दल्ली-राजहरा उस मैदान में जमा हो जाता था. हर साल एक नयी रामलीला मण्डली आकर हमें रामायण का ज्ञान करवाती थी. एक बार लक्ष्मणजी ने शूर्पणखा की नाक काट दी तो हमें काफी दुःख हुआ. शूर्पणखा के नाक का हाल जानने के लिए अपने भाई साहेब के साथ दबे-पाँव स्टेज के पीछे पहुंचा. छुप के देखा तो “शूर्पणखा” एक टेबल के ऊपर बैठ कर बीडी पी रही थी (था). सीन देखकर हमारी हंसी छूट गयी और शूर्पणखा को हमारे उपस्थिति का एहसास हो गया. “कौन है बे?” की पुकार के साथ उसने डंडा उठाकर फेंका और हम वहां से भाग खड़े हुए. खैर, रामलीला हमने कभी भी नहीं छोड़ा.

दशहरे के दिन दल्ली स्टेडियम में रावण के पुतले को जलाया जाता था. उसके पहले सारे शहर में जुलूस निकाला जाता था. जब रावण को जलाकर लौटते थे तो पहली बार ठण्ड का एहसास होता था. वो सर्दियों के दिन प्रारम्भ होने की सूचना हुआ करती थी. फिर डब्बों में बंद स्वेटर और कम्बल बाहर आने लग जाते थे. दीपावली के लिए सभी घरों में सफाई शुरू हो जाती थी. उन दिनों जीवन में प्लास्टिक का उपयोग होता ही नहीं था. जब शाम को सूखे कचरे को जलाया जाता था, उसमें से भी भीनी-भीनी खुशबु ही आया करती थी. सारे बच्चे आग के इर्द-गिर्द जमा हो कुछ न कुछ खुरापात में लग जाते थे. सभी घरों में माताएँ दीपावली के पकवान बनाने में व्यस्त हो जाया करते थे. नए कपड़ों, दिया-बाती और पटाखों की खरीदारी भी साथ के साथ चालु रहती थी. मुख्य पटाखों को लक्ष्मी पूजा के लिए बचा के रखा जाता था. दशहरे के बाद से ही हम सब टिकली पटाखे और उसको फोड़नेवाली पिस्तौल के साथ चोर-पुलिस का खेल शुरू कर दिया करते थे. जिनके पास पिस्तौल नहीं होती थी वो टिकली पटाखे या तो पत्थर से फोड़ते थे या फिर दीवाल में घिस के फोड़ते थे. इस सिलसिले में एक और किस्सा याद आता है, 1987 या 88 में सर्कस ग्राउंड में फटाखों की दूकान में भीषण आग लगी थी जिस में काफी नुकसान हुआ था.

धन-तेरस आते आते सारे घर सज-धज के तैयार हो जाते थे. कई घरों में रंगीन कंदीलें लटकाई जाती थी. बाकी घरों में दिए जलाए जाते थे. शाम होते-होते लक्ष्मी पूजन की समाप्ति होती थी, फिर पटाखों की बारी आती थी. लक्ष्मी-बम, एटम-बम, चिटपटरी-बम, अनारदाना, सुरसुरी (बाद में पता चला की उसे फुलझड़ी भी कहते हैं :-P), चकरी, राकेट और सांप.... ना जाने कितने किस्म के फटाखों को फोड़ा जाता था. कुछ लोगों के पटाखे जल्दी ख़तम हो जाते थे और कुछ के देर रात तक चलते थे. जिनके ख़तम हो जाते थे वो दूसरों के पटाखे देखकर मायूस हो के बैठे रहते थे. कसम से अगर भगवान् उस समय प्रकट होते और वर मांगने को कहते तो 10 लक्ष्मी-बम और 5 चिटपटरी से ज्यादा कुछ और नहीं मांगते. और फिर अगली सुबह फूटे पटाखों के बीच में से बिना फूटे पटाखों को ढूँढ के जमा करते थे, जिन्हें बकायदा धुप में सुखाकर फिर से फोड़ा जाता था.

लक्ष्मी-पूजा की रात को फिर घर पे बने हुए पकवानों का आदान-प्रदान होता था. एक स्ट्रीट में 20-22 परिवार होते थे और सबके पकवान एक दुसरे के घरों में जाते थे. अगले दिन गोवर्धन–पूजा के उपलक्ष्य में गाय के साथ राउत लोग आते थे और उन सभी घरों के सामने “राउत-नाचा” करते थे जहां गाय पाली जाती थी. फिर भाई-दूज के साथ दीपावली की समाप्ति हो जाती थी. फिर से पाठशालाएं खुल जाती थी और हम अपने जीवन में व्यस्त हो जाते थे, अगली दीपावली के इंतज़ार में.

दल्ली-राजहरा में रहते हुए कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि दीपावली सिर्फ हिन्दुओं का त्यौहार है. हमारे लिए तो ये सबका त्यौहार हुआ करता था. हम भी नए कपडे पहनते थे, हमारे घर भी सजते थे, हम भी पटाखे चलाते थे और सभी दोस्तों के साथ खुशियाँ मनाते थे. वक्त ने ना जाने कब इंसानियत के तालाब में ज़हर घोल दिया और त्योहारों का भी बंटवारा हो गया.

लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि दल्ली-राजहरा में जिसने बचपन में दीपावली मनाई हो, वो किसी भी धर्म या जाति का हो, दुनिया के किसी भी कोने में हो, दीपावली की खुशियों से अपने आप को दूर नहीं रख सकता.


बुराई पर भलाई के जीत के इस पावन पर्व पर सभी दल्ली निवासियों और अपने प्रिय मित्रों एवं उनके परिवारजनों को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएँ.

25 अक्टूबर 2015

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 2 फुटबाल)

दल्ली राजहरा का जिक्र हो और वहां के फुटबाल मैचों के बारे में दो शब्द न कहा जाए तो वर्णन अधूरा रह जाएगा. 1980 के दशक में दल्ली का फुटबॉल टुर्नामेंट अपनी चरम अवस्था में था. एक ऐसे शहर में जहाँ तब तक मनोरंजन का साधन सिर्फ आशा टाकीज़ में आनेवाली फ़िल्में और दशहरे को होनेवाली रामलीला थी, वार्षिक आयरन ऑर गोल्ड कप फुटबाल टूर्नामेंट का हर किसी को बेसब्री से इंतज़ार रहता था. सर्दियों के दिनों में होनेवाली उस खेल प्रतियोगिता का दल्लीवासियों के जीवन में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान था.

टूर्नामेन्ट की तैयारी काफी दिन पहले से ही चालु हो जाया करती थी. मैचों का आयोजन हाई-स्कूल सेक्टर में स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम में किया जाता था. टूर्नामेंट की घोषणा होने के पश्चात मैच के तारीखों और टीमों की घोषणा करने वाले लाल-पीले-नीले पर्चे सारे शहर में बांटे जाते थे. हम बच्चों की टोली रिक्शा के पीछे भाग-भाग के ज्यादा से ज्यादा पर्चे बटोरा करते थे. सभी शालाओं में बच्चों को कम कीमत में फुटबाल के टूर्नामेंट पास वितरित करने की व्यवस्था की गयी थी. ये प्रतियोगिता लगभग 15-20 दिन चला करती थी. उन दिनों कक्षाएँ सिर्फ 3-4 घन्टे की होती थी. दोपहर के भोजन के पश्चात् तकरीबन सारा शहर फुटबाल ग्राउंड में आ जाया करता था.
फुटबाल मैदान के सामने तीन मंज़िल की इमारतें हुआ करती थी जिन्हें “तीन-तल्ला” मकान कहा करते थे. उन मकानों के छत मैच के दौरान बिना टिकट दर्शकों से भर जाया करते थे. कुल मिलाकर तीन तरह के टिकट दिए जाते थे, एक कुर्सीवाले टिकट, फिर गैलरी वाले टिकट और फिर ग्राउंड टिकट. टूर्नामेंट पास में 1 से 30 तक नम्बर हुआ करते थे, गेट पे रहनेवाले अंकलजी उस पास को लेकर उस दिन को पंचिंग मशीन से छेद दिया करते थे. मैदान में घुसने के बाद फिर निकलने तक उत्सव का माहौल रहता था.

भारत की लगभग सभी बड़ी टीमें इस प्रतियोगिता में भाग लिया करती थी. मुहम्मडन स्पोर्टिंग, जे.सी.टी. फगवाड़ा, प्रीमियर टायर केरला, बी.एस.एफ. जालंधर इत्यादि टीमों ने हमारे शहर में फ़ुटबाल खेला है. लेकिन सबसे बड़ा आकर्षण तो हमारी दल्ली की टीम ही थी. उन दिनों जिलानी उस्ताद के नेतृत्व में नायडू भैय्या, रूबी डेविड भैय्या, प्रेम नायर भैय्या वगैरा हमारे शहर के स्टार हुआ करते थे. जिस दिन दल्ली टीम का मैच होता था, उस दिन मैदान में तिल धरने की जगह नहीं मिलती थी. जहाँ तक मेरी याद्दाश्त जाती है, 1982 में दल्ली की टीम ने टूर्नामेंट का फाइनल मैच खेला था. सेमी-फाइनल के दौरान मैच के समाप्ति तक स्कोर 0-0 था. मैच अतिरिक्त समय में खेला जाने लगा. उस समय जिलानी उस्ताद दल्ली टीम के प्लेयर कम कोच हुआ करते थे. मैच के आखिरी दस मिनट में जिलानी उस्ताद मैदान में आये. मैच ख़तम होने के 5 मिनट पहले दल्ली टीम को एक कोर्नर किक मिला. जिलानी उस्ताद खुद उस किक को लेने मैदान में उतरे. दस साल की उम्र में पहली बार मैंने जीवन में चमत्कार देखा था. जिलानी उस्ताद द्वारा लिया गया अर्धवृत्ताकार किक 7 – 8 लोगों के ऊपर से गुज़रता हुआ सीधे गोल में घुस गया. बरसों बाद ब्राज़ील के खिलाडी रोबेर्टो कार्लोस (जो आजकल दिल्ली डायनामो के खिलाडी हैं) को वर्ल्ड-कप में ऐसा चकरी-किक मारते देख उस्ताद की याद फिर से ताज़ा हो गयी थी. मुझे पूरा यकीन है कि उस मैच को देखनेवाला कोई भी दल्लीवासी उस किक को जीवन भर भूल नहीं सकता. अगले दिन दल्ली की टीम फाइनल मैच हार गयी, लेकिन फिर भी हमारे शहर के खिलाड़ी सभी के आँखों के तारे बने रहे. बाद में भी इस कहानी को आगे बढानेवाले विल्सन भैय्या, कान्चा भैय्या और निर्मल इत्यादि काफी अच्छे खिलाडियों ने दल्ली का नाम खूब रोशन किया.

और आखिरी में एक बात और, फ़ुटबाल मैच की बात हो और बाबु मोशाय का जिक्र ना हो तो ये सरासर अन्याय होगा. मुहम्मडन स्पोर्टिंग की टीम के साथ मिठाई बेचनेवाले एक बंगाली बाबु आया करते थे. “लेमन चुस्स्स्स..........” की पुकार से उनके इर्द-गिर्द बच्चों का मेला लग जाया करता था. बाबूजी बड़ी महँगी मिठाइयाँ बेचा करते थे (उन दिनों 5 पैसों में एक मिठाई या टॉफ़ी मिला करती थी. लेकिन बाबु मोशाय 1 रुपये में 5 मिठाई दिया करते थे. जो कि हमारे हिसाब से काफी महँगी थी) smile emoticonsmile emoticonsmile emoticon

कांच की भरणी में रखी मिठाइयाँ लाल, हरे, नारंगी और काले रंग की हुआ करती थी. उसमें से काली मिठाई बड़ी स्वादिष्ट हुआ करती थी. इमली की खटास और मिठास मिलकर एक अजीब सा स्वाद उस मिठाई में आता था. बच्चे या बड़े, नर या नारी हर कोई बाबु मोशाय के पीछे पड़ जाता और कहता, “काला वाला दो, काला वाला”, और बाबु मोशाय बड़ी सफाई से 5 में 1 काली मिठाई डालते थे. अगर गलती से किसी को 5 में 2 काली मिठाई मिल जाए तो वो अपने आप को प्रधानमन्त्री से कम नहीं समझता था. और पलक झपकते ही “लेमन चुस्स्स्स, बाबू चुस्स्स्स.......” की पुकार के साथ हमारे बाबु मोशाय काफी दूर निकल जाते थे. फिर उन मिठाइयों के लिए अगले दिन तक इंतज़ार करना पड़ता था, और टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद अगले साल तक इंतज़ार करना पड़ता था.


वक्त अपने धीमे क़दमों से चलता हुआ ना जाने कितने सावन पार कर गया. समय की लहरों ने उस छोटे शहर से निकालकर दुनियां के बड़े-बड़े शहरों में घुमने का अवसर प्रदान किया. जीवन में फिर हजारों तरह की मिठाइयाँ खायी मगर उस जैसा स्वाद फिर कहीं नहीं मिला. मिठाइयों के बड़े-बड़े दुकानों में आज भी नज़रें उस कालीवाली मिठाई को ढूंढती है, और दिल चाहता है कि वो पुकार फिर से सुनाई दे, “लेमन चुस्स्स्स...........................”.


--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग - 1)

अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक मुझे यही लगता है कि मेरा जन्म “दल्ली-राजहरा” में हुआ. आज लगभग 25 साल हो चुके हैं उस शहर को अलविदा कहे हुए, लेकिन ऐसा लगता है कि सिर्फ मेरा शरीर ही वहाँ से निकल पाया. मेरी आत्मा आज भी उस शहर के गलियों और चौबारों में भटक रही है.

1972 में दल्ली-राजहरा के बी.एस.पी. अस्पताल में मेरा जन्म हुआ. 1978 में बी. एस.पी. शाला क्रमांक 6 में शिक्षा का प्रारम्भ हुआ. साहू सर, ठाकुर मेडम ये आज भी यादों में छाए हुए हैं. फिर शाला क्रमांक 2 में उच्चशिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1990 में मैंने भारतीय नौ-सेना ज्वाइन कर ली. तब से ज़िन्दगी इतनी भाग-दौड़ भरी हो गयी कि फिर से उस मिट्टी को छूने की तमन्ना बस तमन्ना बनकर ही रह गयी.



मैं आभारी हूँ उन सभी शिक्षकों का, जिन्होंने मुझे जीवन के अनमोल पाठ पढाये. भौतिक विज्ञान के चंद्राकर सर, संस्कृत के सोनवानी सर, हिंदी के उदयराम साहू सर, केमिस्ट्री वाले तिवारी सर, इंग्लिश के वर्याम सर और भी अनगिनत शिक्षकों ने जीवन को दिशा देने में भारी योगदान दिया.


दल्ली की सुनहरी यादों में वार्षिक फुटबॉल टूर्नामेंट भी हुआ करता था जिसका की हर दल्लीवासी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता था. दशहरा के पहले 6 नम्बर स्कूल के मैदान में होनेवाली रामलीला को देखने के लिए शाम को 4 बजे ही हम बोरी बिछा के तैयार हो जाया करते थे. आशा टाकीज़ में आनेवाली हर नयी फिल्म का ऐलान अमीन सायनी के तर्ज़ पर रिक्शा में माइक लगाकर किया जाता था. गणेश पूजा के दौरान हर स्ट्रीट में एक कमेटी बनती थी और गणेश बिठाया जाता था. पंडरदल्ली के क्लब के पास सप्ताह में एक दिन ओपन एयर फिल्म शो हुआ करता था, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे. तब शहर में टी.वी. का चलन शुरू नहीं हुआ था.


31 अक्तूबर 1984 को पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिराजी की निर्मम हत्या के बाद सारे भारत में दंगे भड़क उठे थे. लेकिन हमारा शहर शान्ति और भाईचारे का प्रतीक बना हुआ था. इंदिराजी की अंतिम यात्रा के दर्शन के लिए “राठौर ब्रदर्स” की दूकान से काफी टीवी बिके थे. तब छतों के ऊपर लम्बे एंटीना को लगाने के बाद रायपुर दूरदर्शन के दर्शन होते थे. फिर एक-दो साल में दल्ली में भी टी.वी. रिले सेंटर आ गया. उस दौरान रेलवेओवरब्रिज से पहले महावीर टाकीज़ का उद्घाटन हुआ जहाँ जैकीश्राफ की “हीरो” फिल्म रिलीज़ हुई थी.


सप्तागिरी पार्क की शामें, राजहरा बाबा मंदिर की शान्ति, बोरडी डैम की यात्रा, दल्ली और उससे लगे हुए प्रदेशों की सुन्दरता, ऐसा अनुभव फिर जीवन में कहीं नहीं मिला. इस यादों के सफ़र से गुजरने वाले हर पुराने साथियों को वो हसीन दिन ज़रूर याद आयेंगे. ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि अपने जीवन के सफ़र में मुझे फिर से दल्ली दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो.

--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – 4)

  बुआ सर का एक्ज़ीक्यूटिव आर्डर   दौर था 1994 का | कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन में ये सवाल हमेशा के लिए सवाल बनकर रह गया कि ये एक्ज़ीक्यूटिव आ...