27 अक्टूबर 2022

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – 4)

 बुआ सर का एक्ज़ीक्यूटिव आर्डर

 

दौर था 1994 का | कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन में ये सवाल हमेशा के लिए सवाल बनकर रह गया कि ये एक्ज़ीक्यूटिव आर्डर क्या होता है? फिर दौर आया गूगल का | हमने सर्च किया इस सवाल का जवाब, और गूगल ने हमें बताया कि, “Q: What is an Executive Order? A: Executive orders are issued by the President of the United States, acting in his capacity as head of the executive branch, directing a federal official or administrative agency to engage in a course of action or refrain from a course of action.” कुल मिलाकर बोले तो अभी भी कुछ समझ नहीं आया |

 

ये कहानी दो व्यक्तियों की नहीं है, बल्कि दो व्यक्तित्वों की है | एक तरफ झील के जैसे शांत KK सिंह सर और दूसरी तरफ खतरनाक समुद्र के जैसे रौद्र और अन्प्रेडीक्कटेबल KS कटोच सर | किसी भी कहानी को आगे बढाने के पहले किरदारों का परिचय बहुत ज़रूरी है | तो थोड़ी सी मशक्कत इस विषय पर भी हो जाए तो अच्छा है |

 

KK सिंह सर सर्वेयरों के बीच बुआ सर के नाम से मशहूर थे | इतने शांत इंसान को मैनें जीवन में कभी नहीं देखा | हर किसी को वो “बुआ” कह के संबोधित करते थे , जिसके चलते उनका नाम ही “बुआ सर” पड गया था | जूनियर मोस्ट सी-2 को भी वो कभी ऑर्डर नहीं देते थे , बस रिक्वेस्ट करते थे , “बुआ , ये काम कर दो.” कहते समय उनके चेहरे पे ऐसा दर्द छलकता था कि सी-2 सारे काम छोड़कर उनका काम करने लग जाता था. इतने अहिंसावादी कि मच्छर या खटमल काटे तो उसको भी प्यार से बोल देते थे ,”हाँ बुआ,तुम भी थोडा खून पी लो .” 14 साल की सर्विस, मगर आज तक बुआ सर ने किसी को भी कोई आर्डर नहीं दिया | प्रेम-पुजारी थे और प्रेम ही उनके जीवन की साधना थी |

 

दूसरी तरफ दिल्ली के KS कटोच सर या कुलदीप सिंह कटोच सर अपने ज़माने के खतरनाक किरदार हुआ करते थे . ह्रिष्ट-पुष्ट शरीर के धनी कटोच सर किसी से भी दो-दो हाथ करने को सदैव तैयार रहते थे | उनके किरदार के वर्णन के लिए एक किस्से का बखान बहुत ज़रूरी है | कटोच सर सर्विस में कभी MLR नहीं बने | सरजी जब निरूपक में थे तो उनकी शादी हो गई थी | भाभीजी ने शायद कहा कि मुझे भी साथ ले चलो , लेकिन सरजी ने मन कर दिया | बात बढती चली गयी | भाभीजी की पहचान उस समय के एडमिरल विष्णु भागवत तक थी | CNS का सन्देश CNC के थ्रू शिप के कप्तान तक पहुँचा कि कटोच सर को MLR बनाया जाए | कटोच सर ने साफ़ मन कर दिया | सी. ओ. साब थे कमांडर अशोकन सर, उन्होंने केबिन में बुलाकर कटोच सर से कारण पूछा | कटोच सर ने जवाब दिया , “Sir, I cannot serve two Masters at a time”. सी. ओ. साब भी दहल गए, शादी-शुदा थे इसलिए बात की गहराई भी समझ गए |

 

मगर बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई . एडमिरल विष्णु भागवत साब भी चिन्दिगिरी में माहिर थे. थे तो एडमिरल, मगर काम दरिद्दरों वाला करते थे | मुंबई में जब सी-एन-सी हुआ करते थे तो उनके गाडी के पीछे पीछे रेगुलेटिंग वालों की गाडी चलती थी | जो कोई बंदा सेल्यूट ना मारे, उसका नाम-नंबर तुरंत नोट हो जाता था , अगले दिन शिप में फर्रा आता और या तो नंबर 11 या नंबर 12 या फिर जी.सी.बी. का जाना तय था. मुंबई सर्वे के दौरान सतलज के काफी बन्दे इसका शिकार हुए | तो बात आन बैठी की सी-एन-एस के कहने पर भी कटोच सर एमएलआर नहीं बने | उन दिनों सी-एन-सी वेस्ट और जहाज के सी.ओ. साब के 2 ही काम थे. एक - कमांड संभालिये, दो – कटोच सर को एमएलआर बनाना है. खैर कटोच सर किसी भी तरह पकड़ में ना आये . दौर था 1998 का | फायनली सूचना मिली कि कटोच सर को सर्विस से टर्मिनेट किया जाएगा और उनको घर भेजकर एमएलआर बनाया जाएगा | मगर कटोच सर तो कटोच सर निकले ....

 

And rest is history...................

 

30 December 1998 को एडमिरल विष्णु भागवत को ही सर्विस से निकाल दिया गया |

 

अब सीधे कहानी पर आते हैं. मुंबई सर्वे सतलज के बहुत ही परिश्रमी सर्वे में से एक था . सतलज की 4 बोट हुआ करती थी. पोलोक, पिट्रेल, सी-गल और सालमोन. सारे बोट सुबह-सुबह चार दिशाओं में रवाना होती थी और शाम को शिप में लौटकर आती थी. साल्मोन बोट के साउंडर (ऑफिसर-इन-चार्ज) बुआ सर थे और कोक्सन कटोच सर थे. बहुत मजे से सर्वे के दिन चल रहे थे. शांत प्रकृति के बुआ सर आराम से बैठते थे और कटोच सर के कमांड में कोई और चूं तक नहीं करता था .

 

फिर आया हादसे का वो दिन. और दिनों की तरह ही उस दिन भी सालमोन लोड होकर सुबह सुबह चल पड़ी . बुआ सर और कटोच सर के अलावा रोहन जॉन, RB सिंह , JN श्रीवास्तव सर और मेरा बैची खडन्ग भी उस बोट में थे. गल आयलेंड के पास में शोर पार्टी को उतारने के पश्चात बोट काम में जुट गयी. शाम तक निर्बाध रूप से कार्य चलता रहा . शाम को अचानक सी थोडा रफ हो गया . आईलेंड में शोर पार्टी फंसी पड़ी थी . मामला रिस्की था. कटोच सर ने बोट को आईलेंड में ले जाने से मना कर दिया .

 

बुआ सर ने प्रेम से कहा, “अरे बुआ , ले लो ना बोट किनारे की तरफ “

 

कटोच सर ने साफ़ मन कर दिया .

 

ये बहस कोई 10 मिनिट के करीब चली |

फिर बुआ सर ने जीवन में पहली बार आर्डर दिया | बोले , “बुआ , आई एम् गिविंग यु ऑर्डर , टेक द बोट टू आयलेंड “

 

कटोच सर ने भी बोला , “ सर , आय रिफ्युस टू ओबे योर आर्डर “

 

बुआ सर सकते में आ गए . उनके तरकश के सारे बाण ख़तम हो चुके थे . एक तो पहली बार जीवन में ऑर्डर दिया , वो भी रेफ्युस हो गया . अब क्या करें ? बड़ी दुविधा थी . फिर से कहा , “बुआ , ले चलो ना बोट”.... फिर से मनाही आ गयी.

 

हारकर बुआ सर ने कटोच सर से ही पुछा , “ ऐसा क्या करूँ कि तुम बोट को आयलेंड लेकर जाओगे ?”

 

कटोच सर ने कहा, “सर, गिव मी एक्सिक्यूटिव आर्डर”.

 

बुआ सर की आँखें चमक उठी. अँधेरे में उजाले की एक किरण दिख पड़ी. आज उनकी दयालु आँखों में खून उतर आया , भुजाएं फड़क उठी, मुखमुद्रा रौद्र भाव से तप उठी , कटोच सर की आँखों में आँखें डालकर बुआ सर दहाड़ पड़े , “लीडिंग सीमेन कटोच, आय एम् गिविंग यु एन एक्सिक्यूटिव आर्डर , टेक द बोट टू आयलेंड “

 

कटोच सर भी सावधान में आकर रेस्पोंड किये , “आय आय सर”

 

कटोच सर ने बोट को आयलेंड की तरफ मोड़कर फुल थ्रोटल दिया and the rest is History......

 

सालमोन चट्टान से टकराकर डूब गयी . सारे क्र्यू तैरकर आयलेंड में पहुँच गए. जान का नुकसान नहीं हुआ लेकिन सारे सर्वे इक्विपमेंट डूब गए . मेरे बैचमेट दिवंगत आधिकराव विठ्ठलराव खडंग ने बड़ी वीरता के साथ डायविंग करके काफी सामान निकाला जिसके लिए बाद में उसे कमेंडेशन भी मिला . बड़ी मशक्कत के बाद पूरी टीम को आयलेंड से रेस्क्यू किया गया .

 

उपसंहार :

1.   महीनों तक बोर्ड ऑफ़ इंक्वायरी चलती रही . सारे बन्दे काम में लगे रहते और सालमोन पार्टी नंबर 2 पहन के चल पड़ती थी . आलम ये था कि लोगों को लगने लगा कि काश हम भी सालमोन के क्र्यू होते .

 

2.   कटोच सर ने अपने स्टेटमेंट में भी लिखा , “आय हेव रीसिव्ड एन एक्सिक्यूटिव ऑर्डर टू टेक द बोट टू आयलेंड एंड आय फोलोड इट”

 

3.   बुआ सर इस घटना के बाद काफी विचलित और दुखी रहते थे . कई बार नींद में ही बुदबुदा उठते थे . कहते थे , “बुआ, एक्सिक्यूटिव ऑर्डर नहीं देना था “ | उस दिन से हमारे मन में हमेशा शंका रहती थी कि ये एक्सिक्यूटिव ऑर्डर क्या बला है? भगवान् कसम, आज तक जे बात हमारे समझ ना आई .

 

4.   महीनों की बोर्ड ऑफ़ इंक्वायरी के बाद सारे लोग साफ़ बरी हो गए . केस को राईट ऑफ कर दिया गया .


5.   True to his words, Katoch Sir is proudly serving single master (Bhabhiji) at home town Delhi.

 

6.   कटोच सर और बुआ सर से लेखक क्षमाप्रार्थना करता है और अपील है कि अगर हमारी कुटाई करना है तो अकेले में बुलाकर कीजियेगा |

 

नोट : यूँ तो कहानी को मजेदार बनाने के लिए एक छोटी सी घटना को नमक-मिर्च लगाकर पेश किया गया है. ये कथा बोट में दो मित्रों के बीच हुई क्षणिक चुहलबाजी की रोचक प्रस्तुति मात्र है.

 

अगर वास्तविकता देखी जाए तो उस दिन समुन्दर की स्थिति काफी खराब थी. सर्वेयरों को “पायनियर ऑफ़ विर्जिन सी” कहा जाता था . अर्थात किसी जगह की गहराई या खतरों के बारे में पूर्वानुमान ना होते हुए भी जान हथेली पे लेकर उन जगहों में जाया करना हमारे प्रोफेशन का हिस्सा रहा है . हम खतरा उठाते थे, ताकि हमारे पीछे आनेवालों के साथ कोई दुर्घटना ना होए . आज भी समुद्र की गहराई के रहस्यों को जानने के लिए मरीन सर्वेयर ही जोखिम उठाते हैं. फक्र है हमें कि ऐसे प्रोफेशन से ताल्लुक रखते हैं जिसमें हर रोज़ जिंदादिली का एहसास होता है .

 

 

(समाप्त)

17 अक्टूबर 2022

अपशिष्ठ प्रबंधन या Waste Management

कुछ दिनों पहले समुन्दर किनारे से प्लास्टिक बोतलें बीन के माननीय प्रधानमंत्रीजी ने मिसाल कायम की थी. इस विषय पर काफी वाद-प्रतिवाद भी हुआ. इस विषय के पक्ष में कहने वाले इसे एक बेमिसाल उदाहरण मानते हैं और तर्क प्रस्तुत करते हैं की अगर प्रधानमंत्रीजी ने नाटक किया तो देश को स्वच्छ बनाने के लिए आप भी रोज़ एक घंटे नाटक कीजिये.

जी, बिलकुल करने को तैयार हूँ. लेकिन क्या कोई प्रकाश डालेगा कि हिन्दुस्तान का कौन सा शहर अपशिष्ट प्रबंधन (waste management) में स्वयंपर्याप्त (self sufficient) है. हर शहर में टनों प्लास्टिक अपशिष्ट प्रतिदिन जमा होते हैं. इन कचरों को उन जगहों से तो साफ़ कर दिया जाता है जहाँ स्वयं को संभ्रांत कहनेवाले लोग रहते हैं. और इन कचरों को धकेला जाता है उन झुग्गी झोपड़ियों के पास जहाँ समाज का निचला तबका रहता है. ना किसी को इस बात की चिंता है कि कैसे दुर्गन्धपूर्ण वातावरण में उनका जीवन यापन होता है, ना किसी को इस बात की फिकर कि इन कचरों की वजह से कैसी कैसी बीमारियों से उन इंसानों को और उनके बच्चों को जूझना पड़ता है.

बचपन से हमें सिखाया गया की स्वच्छता हज़ार नियामत है. ईश्वर की कृपा से हम में से कई लोगों को ऐसा जीवन मिला कि संभ्रांत एवं स्वच्छ इलाकों में ज़िन्दगी गुज़र रही है. मगर उन लोगों का क्या जो गरीब हैं, जो झुग्गी झोपड़ियों में जीवन बसर करते हैं. क्या वे भारतीय नागरिक नहीं हैं? क्या उनके जीवन में स्वच्छता का अधिकार नहीं है?

मैं मानता हूँ कि स्वच्छता कि पहल के रूप में वर्त्तमान सरकार ने शौचालयों का निर्माण किया है. मगर अपशिष्ट प्रबंधन में आज भी सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा सकी है. किसी भी शहर के नगरपालिका या पंचायत के पास इस बात की कोई कारगर जानकारी नहीं है कि उनके शहर या गाँव में एक दिन में कितने टन अपशिष्ट बनते हैं, कितने टन को प्रोसेस करके ख़तम किया जा सकता है. 

एक सरल उदाहरण प्रस्तुत करूँगा. अगर आप एक बच्चे को फुटबाल खिलाड़ी बनाना चाहते हों और सिर्फ उसे महान खिलाड़ी बनाने के लिए दो कदम लेते हो. एक :- उसे एक फ़ुटबाल खरीद कर देते हो. दो :- उसे टीवी पर मेस्सी और रोनाल्डो के खेल दिखवाते हो. फिर अगर आप ये सपना देख रहे हो कि वो बच्चा एक दिन महान खिलाड़ी बनेगा तो ये सिर्फ सपना ही बन के रह जाएगा. बच्चे की खिलाड़ी बनाने के लिए और भी बहुत चीज़ें चाहिए. एक मैदान चाहिए खेलने के लिए, 21 साथी खिलाड़ी चाहिए, एक प्रशिक्षक चाहिए, वक्त चाहिए, प्रोटीनयुक्त भोजन चाहिए, उसे मुकाबलों का अनुभव मिले ऐसी व्यवस्था चाहिए.

आइये इसी उदाहरण को अब उपरोक्त विषय के साथ मिलाकर देखें. भारत को स्वच्छ बनाना है तो सिर्फ अखबारों का विज्ञापन या केमरे के आगे किया गया अभिनय काफी नहीं होगा. इसके लिए कई कठोर एवं सक्षम कदम उठाने की ज़रुरत है. मेरी अल्पबुध्धि में जो विचार आ रहे हैं, उसे प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

1. सर्वप्रथम देश में सभी राज्यों को एक समान रूप से बाधक एक “प्लास्टिक नियम” की आवश्यकता है. प्लास्टिक के उपयोग में रोक, खाद्य वस्तुओं को प्लास्टिक से दूर रखने के कारगर उपाय, प्लास्टिक के जगह अन्य वस्तुओं का विकल्प आदि पर सभी राज्यों को सामान रूप से निर्देश दिए जाने चाहिए.

2. देश के सभी जिलों में एक “अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र” (Waste Management Centre) होना चाहिए. सारे जिले का कचरा इस केंद्र में आने के बाद जैविक और अजैविक कचरे में तब्दील कर इसे पूर्ण रूप से ख़तम करने की प्रक्रिया की रूप रेखा बननी चाहिए. हर गली में बड़ा कूड़ेदान और उस कूड़ेदान को नियमित रूप से साफ़ करने के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए. अलग से कहने की ज़रुरत नहीं कि सुव्यवस्थित रूप से अगर किया जाए तो ये प्रक्रिया भारी मात्र में रोज़गार भी पैदा करेगी. 

3. सभी बड़ी कंपनियों को ताकीद दी जाए कि अपने उत्पन्नों को प्लास्टिक में लपेट के बेचने की जगह वैकल्पिक व्यवस्था का प्रावधान करें. फिर भी प्लास्टिक में लपेट के सामान बेचनेवालों के ऊपर 200% अतिरिक्त कर लगाया जाए. सामान जब महंगे होंगे तो लोग अपने आप ही उसके उपयोगों से दूर होंगे.

4. हर सब्जी की दूकान , कसाई की दूकान आदि को लायसेंस देने के पहले इस बात की कड़ी जांच की जाए की वो अपना कचरा किस तरह प्रोसेस करते हैं. क्या उन्होंने बायो प्लांट लगाया है. अगर वो इस काम में नगरपालिका का सहयोग चाहते हैं तो उन पर अलग से कर लगाया जाए.

4. और उपरोक्त सभी व्यवस्था करने के बाद आम जनता को भी क़ानून के दायरे में लाया जाए. स्कूल के बच्चों से लेकर आफिस के साहबजादे तक कपडे की थैलियों को लेकर चलने के लिए प्रेरित किया जाए. क़ानून के बनने के बाद सख्त जुर्माने की व्यवस्था की जाए. आज हालात ये हैं कि आम जनता को तो आप उपदेश दे रहे हो कि स्वच्छता बनाएँ, लेकिन बाजारों में प्लास्टिक उत्पाद धड़ल्ले से बिक रहे हैं. जनता को आप विकल्प नहीं दे रहे हो और जनता से उम्मीद है कि स्वच्छता बनाएँ.

अगर ऊपर कही गए बातों को सख्ती से किया जाए तो मजाल है की देश फिर स्वच्छ ना रहे.

जनाब फ़ुटबाल खेलना चाहता हूँ, मुझे मैदान तो दीजिये. 

समुन्दर किनारे से प्लास्टिक बोतल उठाकर बड़ी काली प्लास्टिक थैली में डाला, बड़ी प्लास्टिक थैली को उस होटल के कूड़ेदान में डाला, नगरपालिका के गाडी ने वहां से कूड़ेदान को उठाकर शहर के दूसरे तरफ बने झुग्गी झोपड़ियों के पास बने मैदान में डाला................. अब वहाँ से आगे क्या? क्या भारत वाकई स्वच्छ हो गया? क्या वो प्लास्टिक के बोतल हमारे पावन धरती से हमेशा के लिए ख़तम हो गए? यहाँ कचरे का संस्करण तो हो नहीं रहा है. बस, कचरे को एक जगह से उठाकर दूसरे जगह छुपाया जा रहा है. क्या यही स्वच्छता के मानदंड हैं?

नहीं जनाब. आप जिस पद पर बैठे हैं, आपका काम कचरा उठाना नहीं है. आप हमें व्यवस्था दीजिये, इन कचरों को हमेशा के लिए ख़त्म करने का मार्गदर्शन दीजिये, इन्फ्रास्ट्रक्चर दीजिये, सख्त नियम बनाइये और हम देश के नागरिक साबित करेंगे कि “हम किसी से कम नहीं”

जय हिन्द!!!

04 अक्टूबर 2022

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – ३)

बोंडे की आफत

 

*बोंडा*

 

बोंडा सर्विस का एक अहम् भोज्य पदार्थ है. वी रेशन के लिए ये एक पत्नी की तरह है, यानी की उसका अधिकार है. और एस रेशन और मौकाटेरियनों के लिए बोंडा एक पड़ोसन के जैसे ठहरी कि मौका मिले और हाथ मार लिए . बोंडे के बगैर वी रेशन का भोजन अधूरा रह जाता था . एक बार बड़े खाने के दौरान हमने एक जाट भाई को कुकड़े से लड़ते देखा . कह रहा था कि सारे डिश यहाँ क्यों नहीं रखे.  कुक बेचारा गिना रहा था कि पनीर है, कोफ्ता है , मिक्स्ड वेजिटेबल है ..... मगर जाट भाई बोले कि “भई, बोंडा किधर है?” खैर ये इस कहानी के पात्र का परिचय मात्र  था .

 

*मास्साब*

 

कहानी के दूसरे पात्र मास्साब ठहरे . मास्साब से मेरी मुलाक़ात १९९४ के एक सुबह में हुई जब मैं SR-2 का कोर्स करके सतलज में वापस आया. वो तब भी ठीक ऐसे ही दिखते थे जैसे आज दिखते हैं. सतलज शिप्स कंपनी उन दिनों मास्साब के खौफ तले असहाय अवस्था में जी रही थी. मास्साब की अगर पूरी कहानियों को टंकित किया जाय तो शायद बहुत बड़े उपन्यास के रचना होने की संभावना है. फिर भी नयी पीढ़ी के लोगों को बता दूं कि मास्साब कितनी बड़ी हस्ती थे आप उसका अनुमान भी नहीं लगा सकते. KGF फिल्म के रॉकी भाई भी अगर मास्साब के रेंज में आते तो उसको भी प्लान्जे पे लटका के उससे बोथा मरवा देते . मास्साब के पास हर समस्या का समाधान हुआ करता था. एक बार ओखा में 3 घंटे की कोशिश के बावजूद भी कप्तान साब जहाज को जेट्टी पे ना लगा पाए, मास्साब ने बोशन स्टोर से टेक्कल मंगवाया और टेक्कल के सहारे शिप को एलोंगसाइड लगवा दिया. वैसे बता दें कि टेक्कल उनका प्रिय हथियार हुआ करता था. मास्साब इतने जुझारू प्रकृति के थे कि उन्होंने सरेआम , सारी शिप्स कंपनी के सामने कप्तान लूकोस से अपने  पैर छुवा के माफ़ी मांगने पे मजबूर किया था . खैर वो सब कहानियाँ फिर कभी.

 

*मुख्य कथा*

 

कहानी घटित होती है सतलज में. आम दिनचर्या के तहत मास्साब रोज सुबह बोथ्वाचेस में सबको कार्य सौंपने के बाद पूरे जहाज का राउंड लेते थे . लेखक उन दिनों मास्साब के असिस्टेंट हुआ करते थे . मास्साब आगे आगे चलते थे और हम जनाब के पीछे-पीछे कदम से कदम मिलाकर चला करते थे.  मास्साब का राउंड ठीक 10 बजकर 10 मिनिट पे शिप्स गैली में पहुँचा करता था .किंवदंतियों की मानी जाय तो इसी घटना के कारण सभी घड़ियों का टाईम 10:10 पे रखा जाता है. स्टेंड इजी से 15 मिनिट पहले पहुँचने वाले इस राउंड का उद्देश्य शिप्स कंपनी के भोजन के स्टैण्डर्ड को परखना हुआ करता था. मास्साब के लिए दो गरमागरम बोंडे वहां स्टैंडबाई हुआ करते थे . मास्साब खाते थे और चल पड़ते थे . बरसों से ये प्रथा चली आ रही थी , बे-रोक टोक, निर्बाध.

 

एक दिन लोजिस्टिक डिपार्टमेंट में एक मास्साब का आगमन हुआ. काले रंग के मास्साब केरला से थे और उनकी नाक में एक मस्सा भी था . आते ही उन्होंने लोजिस्टिक डिपार्टमेंट का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया.

 

घटना की वो सुबह अपने आप में भीषण थी. आसमान में काले बादल छाए थे ,  शिप्स कंपनी मास्साब के निर्देशों के तहत विभिन्न कार्यों में व्यस्त थी. ठीक 10 बजकर 10 मिनिट में मास्साब अपने चिर-परिचित अंदाज़ में गैली में पहुँचे. लेखक उनके ठीक पीछे था. गैली में जैसे ही कुक ने बोंडे को प्लेट पे रखे नए मास्टर चीफ कुक ने पुछा , “क्या कर रहे हो?” कुक डरता सहमता सा बोला , “मास्साब के लिए बोंडा”. मास्टर चीफ कुक ने बोला , “कोई बोंडा – वोंडा नहीं है. सर्विस रूल के हिसाब से चलने का “. अपने कुक को डफाराने के बाद मास्टर चीफ कुक हमारे मास्साब को अनदेखा कर अपने काम में लग गए. अपमान की पराकाष्ठा थी. खून हमारा इतना खौला कि मास्टर कुकड़े को उठा के पटक दे. लेकिन हमारे प्यारे मास्साब अविचलित थे . ऐनक के ऊपर से उन्होंने सम्पूर्ण गैली का मुआयना किया , चुपचाप मुड़े और चल पड़े.

 

मास्साब सीधा पहुँचे एक्सो-साब के केबिन में. बदवार साब अपनी धुन में कुछ सोचते हुए बैठे थे. मास्साब बोले ...

 

जय हिन्द सर.

 

जय हिन्द मासाब , क्या हुआ ?

 

सर, लोजिस्टिक डिपार्टमेंट का ड्रिल बहुत दिनों से नहीं हुआ है. करवाना था ज़रा .

 

ठीक है मास्साब, आप देख लीजिये .

 

सधे क़दमों से मास्साब चल पड़े गणर्स स्टोर की तरफ. लीडिंग सीमेन क्यू ए – 1 संजय जेन्वी वहां विराजमान थे. डेली आर्डर बनाना उनका काम था . मास्साब ने आदेश दिया , कल फोर्टीन थर्टी लोजिस्टिक डिपार्टमेंट का ड्रिल होगा . गणर्स योमेन के चेहरे पर हमने ख़ुशी की एक झलक देखी. उस दिन के डेली ऑर्डर में ये आदेश भी आ गया.

 

1430 बड़े मजेदार चीज़ है. एक चार तीन शून्य बोलो – कोई असर नहीं पड़ता . एक हज़ार चार सौ तीस बोलो – कोई फर्क नहीं पड़ता है, और कुछ भी बोलो किसी को कोई फर्क ना पड़े. लेकिन अगर “फोर्टीन थर्टी “ बोलो, जूनियर सेलरों  के दिल दहल उठते हैं.

 

अगले दिन मास्साब ने सब कुछ किया मगर रूटीन के विपरीत गैली की तरफ नहीं गए. अगली दुपहरिया दिल को दहला देनेवाली थी. कोचीन के साउथ जेट्टी में सतलज लोजिस्टिक के जूनियर सेलरों की बहुत ही खतरनाक ड्रिल ली गयी. सीनियर सेलरों को एक पंक्ति में सावधान खड़ा किया गया कड़कती धूप में. नाक में मस्से वाले मास्टर चीफ भी उस कतार में थे. उनका काला चेहरा धूप या अपमान से और भी काला हो चला था. 1430 से 1525 तक ड्रिल चली . बन्दों का नंबर 10 पूरा पानी-पानी हो चला तब जाकर सेक्योर हुआ.

 

सुना है उस रात गैली में घमासान हुआ . कुकड़ों ने मास्टर चीफ (नाक में मस्सा वाले) को घेर के खूब गाली दिया. बोले कि ज्यादा नौटंकी किया तो पानी में फेंक देंगे. ऑफिसर कुक और स्टीवर्ड भी इस युद्ध में शामिल हुए .

 

अगली सुबह बहुत ही शांत और सुन्दर थी. खिला हुआ सूरज और पक्षियों की चहचहाहट दिन को और खूबसूरत बना रही थी. सबको काम पे लगाने के बाद ठीक 10 बजकर 10 मिनिट पर मास्साब गैली पहुँचे. उनका 2 बोंडा थाली में  भाप के साथ एकदम तैयार था . आज नाक में मस्सा वाले मास्टर कुकड़े साब हांड़ी में कडछा चलाने में व्यस्त थे . इतनी आहटों के बावजूद भी उनका ध्यान हांडी से बिलकुल नहीं हटा. मास्साब ने इत्मीनान से बोंडा खाया और साढ़े क़दमों से चल पड़े.

 

इतिहास गवाह है की सतलज के चरित्र में मास्साब के बोंडे पे हाथ डालने की जुर्रत फिर कभी किसी ने ना दिखाई.

 

(कथा समाप्त)

 

यूँ तो इस कथा में हास्य के बहुत तत्व हैं. मगर हमारी पीढ़ी अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझती है कि हमें मास्साब जैसे मार्गदर्शक मिले. जीवन में कठिन-कठिन परिस्थितियों में मास्साब की सीख और उनके जुझारूपने व्यक्तित्व से मिली प्रेरणा ने आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान की. तहे दिल से आपका शुक्रिया है.

 

आज मास्साब की तबियत कुछ खराब चल रही है. पिछले दिनों उन्होंने मुझे सन्देश भेजा कि, ‘जिम्मी, मैं लॉन्ग रीफिट के लिए ड्राई डोक होने जा रहा हूँ”. हमने भी कहा कि, “सर बहुत जल्दी आप फिर सेलिंग करने लगोगे.” हम सब आपको मिस कर रहे हैं. सुबह कितने भी बजे उठो, आपका गुड मोर्निंग पहले ही पहुँचा रहता है. फिर से इंतज़ार है उन दिनों का .......

 

GET WELL SOON SIR.

सर्वेयर कथा पुराण (भाग – 2)

ये कहानी दास दादा की है . AK दास दादा की नहीं है, गाडी चलाने वाले सिंगर सर डैश दादा की भी नहीं है,   PK दास दादा की भी नहीं है. उस ज़माने में हैंड्स काल के बाद ब्रोडकास्ट पे अनूप जलोटा की भजन बजते थे. उस में पूछा जाता था “जल से पतला कौन है, कौन भूमि से भारी ?” और सीनियर लोग एक सुर में कहते थे “जल से पतला दास है, और दास भूमि से भारी”. तो ये कहानी है उन दूसरे दास दादा कि जो ज़रा से भारी थे. भारी बस इतने थे कि जब हैच से उतरते थे तो पहले उनका पेट आता था , फिर करीब 5 मिनिट के बाद उनके दर्शन होते थे . ये कहानी उनके इस अनोखे पेट से जुडी हुई है.


दास दादा अपने आप में एक बहुमुखी प्रतिभा थे. उनका चाल में, उनकी हर अदा में एक रहस्य छुपा हुआ था. अगर किंवदंतियों को सच माना जाए तो दास दादा बताते हैं कि वो बॉर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स में रह चुके थे और कई दुश्मनों को युद्ध भूमि में मार चुके हैं. शिप में जब आर्म्स फायरिंग वगैरा होता था तो दास दादा उसमें भाग नहीं लेते . एक बार मैंने पुछा तो बताया कि मैं LMG से नीचे किसी गन को नहीं चलाता. वैसे वो होमियो के भी प्रेक्टीशनर थे. उनके पास सदैव दवाइयों की एक पोटली हुआ करती थी. शिप के मेडिकल ऑफिसर के साथ – साथ सतलज 45 मेन मेस में दादू की प्रायवेट प्रेक्टीस चला करती थी.  उसके चलते उनका एक निक नेम “दवाई दादू “ भी था. 


एक बार बख्शी सर दवाई दादू के पास सिक परेड चले गए. उन दिनों बख्शी सर शिप के डैवरों के सरदार थे. जब भी जहाज में क्लियर लोवर डेक होता था बख्शी सर और उनकी पूरी टोली ऑक्सीजन सिलेंडर टांग के जहाज का प्रोपेलर चेक करने गोता मार देते थे . फिर क्लियर लोवर डेक ख़तम होने के बाद ही उनके दर्शन होते थे. अगर प्रोपेलर चेकिंग का गिनेस रिकोर्ड होता तो सतलज के प्रोपेलर को “The Most Checked Propeller” का गिनेस रिकोर्ड मिलता . मधु-मुनक्का का स्टोक कभी भी बख्शी सर के पास ख़त्म नहीं होता था . तो बात चल रही थी सिक परेड की. बख्शी सर घुसे दवाई दादू के केबिन में . नाचीज़ वहां खड़ा-खड़ा ब्रासो कर रिया था. दवाई दादू ने पहले बख्शी सर को पालथी मार कर लोवर बंक में बैठने को कहा . फिर उन्होंने अपनी पोटली निकालकर ताम-तबेला फैला दिया . उसके बाद आँखें बंद करके प्रार्थना की. फिर उन्होंने बख्शी सर का नब्ज़ देखा. उसके बाद गंभीर मुद्रा में प्रश्न किया “ बख्शी , तुम्हारे घर में कुछ प्रोब्लम है क्या ?” बख्शी सर ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से कुछ देर दादू को घूरा . फिर तेजी से उठ के भाग लिए . मैं पीछे पीछे गया और पुछा , “सर , क्या हुआ?” बख्शी सर गुस्से की अधिकता में हलके से तोतला बैठते थे . बोले, “थाला मैं थर दर्द का दवाई लेने गया और वो पूछता है कि घर में कुछ प्रॉब्लम है क्या?”. वैसे बख्शी सर का डर भी वाजिब था क्योंकि 2 दिन पहले ही एक लीडिंग कुक घर में प्रॉब्लम है बोलकर मेंटल केस में संजीवनी में एडमिट हुआ था . खैर ये घटना मूल कथा से हट के है. इसका उल्लेख सिर्फ दवाई दादू की मल्टीटेलेंटेड पर्सनाल्टी से आपको अवगत कराना था .  


ये तो हुई सतलज में दवाई दादू के कारनामों की हलकी सी झलक. फिर आया 1994. हम पहुंचे हाइड्रो स्कूल SR-2 करने. दादू भी आये हुए थे SR-1 करने. उस ज़माने की बड़ी बड़ी हस्तियाँ बनवारी लाल सर, खेता राम सर, भट्टी सर, वेदप्रकाश कंडोला सर वगैरा SR-1 क्लास में थे. तो एक शनिवार की शाम को दादा गए लिबर्टी. देर रात करीब 12 बजे लिबर्टी से दादा वापस लौटे. उन दिनों डोरमेट्री में लाईट ऑफ होने के बाद बन्दे लोग बाहर बैठ के टास्क-बुक लिखा करते थे . अचानक से एक आवाज़ सुनकर जब हमने दाहिने देख किया तो देखा कि दादा लुढ़कते हुए ब्लोक की तरफ आ रहे हैं. उनका अंदाज़ बयान कर रहा था कि वो फुल टल्ली हैं. हम लोगों ने उठ के सहारा देना चाहा मगर दादा ने पॉइंट ब्लेंक पे हमें मना कर दिया . ज़ल्दी से कपडा वगैरा खोल के उन्होंने अपना बंगाली गमछा लपेटा . फूर्ती के साथ , बेख़ौफ़ अंदाज़ में वो बाथरूम की तरफ गए . रास्ते में हमको देखकर बोले, “आज तो मज़ा आ गया .” 


दादा का कोंफिडेंस देखकर हम लोगों को भी तसल्ली हुई. हम वापस टास्क-बुक में “हेलियोग्राफ” का चेप्टर कम्प्लीट करने लगे जो कि मास्टर चीफ वेदप्रकाश सर पढ़ाया करते थे. थोड़े देर के बाद दादा उसी कोंफीडेंस के साथ SR-1 ब्लोक की तरफ गए. अचानक जोर से “धम्म” की आवाज़ सुनाई दी . जैसे किसी ट्रक से चावल का बोरा ज़मीन पे गिरा हो . हम दौड़ के गया तो नज़ारा बहुत ही अद्भुत था . दोनों हाथों को कंधे से 180 डिग्री के एंगल पर और दोनों टांगों के बीच 60 डिग्री का एंगल बनाकर दवाई दादू फर्श पे पसरे हुए थे . उनकी आँखें ध्यान-मुद्रा में बंद थी और चेहरे पर असीम शान्ति थी. इसके पहले की हम उनको सहारा देकर उठाते , उनके मुख से शाम की दारु, चखना और फोलोड बाय जो डीनर था वो फव्वारे के रूप में निकल पड़ा . बहुत ही अद्भुत दृश्य था. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के चलते वो फव्वारा वापस उनके मुखमंडल को शोभित करता हुआ फर्श पर ऑस्ट्रेलिया का नक्शा बना बैठा . अब उनको छूना मुश्किल था . उन दिनों हाइड्रो स्कूल में पानी की बड़ी किल्लत थी. अगर दादू की हेल्प करते तो हाथ धोने के लाले पड जाते. तब तक राकेश सर (लाला सर के नाम से मशहूर थे) आये. उन्होंने स्थिति का जायजा लिया और कहा कि “इसे ऐसा ही पड़े रहने दो.” बस सारे वहां से बिखर गए. दरवाजे के आसपास के बिस्तर वाले दुर्गन्ध के चलते उठ उठ के बाहर भाग लिए. लेकिन दादा प्रसन्नचित होकर स्वप्नलोक में विचरण कर रहे थे.


रात के करीब 1 बजे वेदप्रकाश कंडोला सर लिबर्टी से वापस आये. उन्होंने इस नज़ारे को देखने के बाद पूरी स्थिति का जायजा लिया. फिर तेज़ आवाज में उन्होंने कहा , “ ओये.... कोई इसके पेट पे लिख दो , टेंक कलींड ओन 30 अक्टूबर 1994.” पूरा डोरमेट्री ठहाकों की आवाज़ से गूँज उठा मगर दवाई दादू के खर्राटे बेफिक्री से बजे जा रहे थे.


उपसंहार : अगली सुबह दादू ने डोरमेट्री को बड़ी तन्मयता से साफ़ किया . उनके प्रकोप के भय से उनके सामने किसी ने भी इस घटना का उल्लेख नहीं किया. मगर इस घटना के बाद उनके पेट को एक नया प्यारा सा दुलारा सा नाम मिला “टेंक” जो कि कलींड था.


(समाप्त)

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग - 1)

Me and Venkaiya Sir


Year was 1992. Story happened in INS Satluj. Those were the days when Seniors used to be God for Juniors. On one side they used to give us hard time like hell and on other side they used to be our guiding light. Quarter Master and Side-boys were used to be a team and used to stand for each other.


Under such circumstance, I was young "Side-boy" of great Quarter Master Venkaiya Sir.


We used to be commissioning crew of INS Sutlej. As I remember, it was most notorious commissioning crew of that time. Sutlej has commissioned from Garden Reach, Calcutta and came to Vizag for deguassing. Our commanding officer was Commander Jayraman Saab. CO has taken shore accommodation for some reason at that time.


Story begins as our duty was from 1600 to 2000. After secure CO left the ship with side-pipe, MLRs went to home, liberty man also cleared, OOD went to Ward Room. Now the whole ship's security depends on 3 persons only. Mighty Leading Seaman Venkaiya Sir, active side boy SEA2 Jimmy and security sentry EMR2 (in boots, anklet, helmet and danda).


Venkaiya sir was enjoying scene at foxel when shoreline phone rings. Those days that big black phone with round manual dial was in force. It always gave a kirrrr..... kirrrr.....Sound while talking. Venkaiya sir asked me to attend the phone. It was a great privilege for me as SEA2s are not supposed to even touch the phone, forget about shoreline.


I picked up the phone and in my most polite voice said, " Good evening. INS Sutlej."


From other side voice came, "Call OOD"


I politely repeated ,"May I know who is speaking Sir?"


From other end voice came, "This is Captain speaking".


I asked innocently, "Sir, what is your name?"


And phone get disconnected.


Within 1 minute second ring came. I looked towards my quarter master and he gave me signal to attend the phone.


I lifted the cradle. Same story repeated.


Call OOD


Who is speaking?


This is Captain.


What is your name?


This time question came.... "Who are you?"


I said, "This is duty quarter master INS Satluj."


Again, "I am your captain speaking."


"Sir, what is your name?"


Phone disconnected.


Now Venkaiya sir walked towards me.


"Kaun tha?"


"Sir, koi captain hai. Naam nahin bata raha hai."


Venkaiya sir said, "Fuck off. Let the next call come. I will handle him."


With that one dialogue Sir become my Amitabh Bachchan. 


The phone rang again. Venkaiya sir walked towards the phone in slow motion. I was looking admiringly at that scene. It was like Nagarjun making an entry to screen.


Sir picked up the phone and in style said, "Good evening, INS Satluj". From other end something has been said and all of sudden Venkaiya sir was very polite. I was not aware that what is being said from other end but sir was saying.....


Yes Sir


No Sir


Galti ho gaya Sir


Naya Banda hai sir


I will take charge sir


Sorry sir..... And so on.


After cutting the phone Sir ran towards me.


"Sale chutiye, Vo Jayraman Saab ka phone tha"


And I said, "Sir, abhi to gangway se Commander nikle the, Captain kab ban gaye?"


Kasam utha leejiye, after 2 years of service, that day I come to know that a ship's commanding officer is known as Captain also, irrespective of his rank.


And to learn this Venkaiya sir ne foxel pe 20 push up karwaya.



Epilogue : Next day morning again 0800 to 1200 duty thi....


Jayraman saab came onboard with side-pipe. First time he observed me from top to bottom. He turned to Venkaiya sir and asked "This is the same joker from yesterday?" Venkaiya sir said in attention "Yes Sir". Jayraman saab smiled and case closed.


I hope this story will bring some good memories to beloved Venkaiya sir.

02 अक्टूबर 2017

भारत में राजनीति के आयाम

स्वतन्त्रता के बाद से भारतीय राजनीति सदैव उथल-पुथल युक्त ही रही. इसका सबसे बड़ा कारण भारतीय जनता की अज्ञानता ही रही है. अशिक्षित भारतीय जनता ने सदैव से अपने नेताओं को ईश्वर के रूप में देखा. स्वतंत्रता के पहले से ही इस बात का फायदा उठाकर मक्कारों ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली थी. ऐसा कभी नहीं था कि काँग्रेस खराब थी. जितना इतिहास हमने पढ़ा है और समझा है, उस से यही लगता है कि आज़ादी कि लड़ाई में कांग्रेस का बहुत ही बड़ा योगदान रहा. लेकिन, जहाँ एक ओर निःस्वार्थ नेता आज़ादी की जंग लड़ रहे थे, वहीँ मक्कारों और चालबाजों की टोली ने अंग्रेजों के साथ मिली-भगत से सत्ता पाने का षडयंत्र रच लिया था. और अंत में मक्कारों की ही जीत हुई. 15 अगस्त 1947 को सत्ता चाटुकारों ने हड़प ली. सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे सच्चे देश-सेवकों को किनारा करते हुए अपने मतलब की खातिर देश का बंटवारा कर दिया गया और धर्म के नाम पे एक ऐसा ज़हरीला बीज बोया गया जो आज 70 साल बाद भी हमें एक “विकासशील” देश बनाए हुए है , ना कि एक “विकसित” देश.
आजकल सोशिअल मीडिया में रहते हुए दिन भर दोस्तों की लड़ाई देखने का अवसर प्राप्त होता है. कोई श्री मोदीजी के तारीफ़ के पुल बांधता है तो कोई उसके विरोध में तर्क प्रस्तुत करता है. कोई दिन में कई-कई बार हिंदुत्व का हुंकार भरता है तो कोई बार-बार दावा ठोकता है कि देश का मुसलमान खतरे में है. कोई सवाल उठाता है कि 70 साल में देश ने क्या प्रगति की तो कोई उम्मीद जताता है कि आने वाले 20 साल में भारत विश्व की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा.
अगर ध्यान से देखा जाए तो आम भारतीय जनता राजनीतिज्ञों के दोगलेपन का शिकार है, चाहे पार्टी कोई भी हो. ये कहना मजबूरी बन जाती है कि किसी भी पार्टी ने देश के विकास को अपने विकास से ऊपर नहीं रखा. जब भी, जो भी पार्टी शासन में आयी उन्होंने देश के विकास की बजाय व्यक्तिगत विकास पर ही जोर दिया. काँग्रेस देश का कोढ़ थी जिसने गांधी परिवार को इस देश का सर्वस्व बना दिया. एक विदेशी महिला ने इसी बात का फायदा उठाकर कठपुतली सरकार चलाकर देश को जी भरकर लूटा-खसोटा.
इस लूट-खसोट से तंग आकर देश की जनता ने श्री मोदीजी को देश की बागडोर थमाई. यहाँ ये बात साफ़ है कि भारतीय जनता पार्टी पर देश की जनता को कोई विश्वास नहीं था. अगर 2014 का चुनाव बीजेपी आडवाणीजी के नेतृत्व में लडती तो चारों खाने चित्त रहती. एक व्यक्ति विशेष के क्षमता पर लोगों ने अपना विश्वास अर्पित किया. मगर 3 साल बाद जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है. विकास के नाम पर देश की संपूर्ण व्यवस्था में उथल-पुथल मचा दिया गया है. कुछ ऐसी परिभाषायें ला दी गयी हैं जिसके तहत कोई भी सवाल नहीं उठा सकता है. श्री मोदीजी को देश का रक्षक और देश-प्रेम की तस्वीर बना दी गयी है. कुछ ऐसा माहौल है कि आप सरकार की नीतियों पर सवाल करो तो आप देश-द्रोही बन जाते हो. वाह भाई वाह.
4 साल पहले, बीजेपी ने उस समय की सरकार पे आरोप लगाया था कि पेट्रोल और गैस के दाम के कारण आम जनता का जीवन दुभर हो गया है. उस समय अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर थी. आज जब कच्चे तेल की कीमत 54 डॉलर हो गयी है तब भी सरकार उसी दाम पर पेट्रोल बेच के भारी बचत कर रही है. मगर अब दावा ये है कि ये सब देश के विकास के लिए हो रहा है. भाई मेरे, उस समय भी सरकार देश के “विकास” के लिए ही तेल महंगे दामों में बेच रही थी. बीजेपी ने 4 साल पहले पेट्रोल के बढे हुए दामों का विरोध किया , आधार का विरोध किया, GST का विरोध किया और सत्ता में आते ही इन्हीं सभी चीज़ों को देश के विकास का स्त्रोत बताया. तो पहले ही बता देते हुज़ूर. ये दोगलापन क्यों? समर्थकों द्वारा तर्क पे तर्क दिए जाते हैं कि देश का भारी-भरकम विकास हो रहा है. सत्य है. हो भी रहा होगा. लेकिन प्रत्यक्ष में तो बीजेपी की नीतियों से अम्बानीयों और अदानियों का ही फायदा दिखता है. दावा पेश किया जाता है कि इस सरकार ने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया लेकिन पहले ही बजट में 20000 करोड़ रुपये गंगा की सफाई के लिए रख दिए गए. आध्यात्म एवं धर्म को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान देनेवाले भारतीयों को बेवकूफ बनाने का इस से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है? गंगा आज भी मैली है और कोई नहीं जानता कि 20000 करोड़ रुपयों से गंगा कितनी साफ़ हुई. नोट-बंदी से देश का कितना भला हुआ ये तो आनेवाला वक्त बतायेगा, लेकिन आम जनता को इतना तो समझ में आ ही गया कि नोट-बंदी का उद्देश्य देश की भलाई तो बिलकुल नहीं था बल्कि यू. पी. का चुनाव जीतना था.
ये सब लिखने का तात्पर्य ना तो मोदी विरुद्धता है और ना ही काँग्रेस का समर्थन. ये सब लिखने का एक ही तात्पर्य है कि दिन भर अपने ही दोस्तों को अलग-अलग दल बनाकर एक दुसरे से बहस करते हुए देखना पड़ता है. यारों, कम से कम अब भी समझ जाओ की इन राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य देश की भलाई कभी ना रही ना रहेगी. अगर किसी दिन ऐसी कोई पार्टी का शासन आ जाए तो विकास के लिए कभी 25 साल इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. जो पार्टी आते ही “आरक्षण” को हटा दे , समझ लेना वही इस देश में वास्तविक विकास लाने जा रही है (असंभव , असंभव ). वरना बाकी सब तो हम सबको अलग-अलग टोपी पहनाकर अपना उल्लू सीधा करेगी. कभी देश-प्रेम की टोपी, कभी विकास की टोपी, कभी धरम की टोपी.
हाँ अंत में एक और बात. जिस हिसाब से सब कुछ चल रहा है, इस बात में कोई शक नहीं कि अगला चुनाव भी श्री मोदीजी ही जीतेंगे. वो इसलिए नहीं होगा कि उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया, बल्कि इसलिए होगा कि भ्रष्टाचार की पराकाष्टा के चलते अब विपक्ष में ऐसा कोई नेता नहीं बचा जिस पे जनता अपना विश्वास अर्पित कर सके.
अब जब जुमलों की ही सरकार चल रही है तो हम भी इस जुमले के सहारे बैठे हैं कि “उम्मीद पे दुनियां कायम है “ . जय हिन्द.

15 मार्च 2016

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 5) – बचपन के स्वाद

बचपन के स्वाद हमें जीवन भर याद रहते हैं. क्योंकि उस में स्वाद के साथ-साथ जीवन के विभिन्न अनुभवों की मिठास होती है. दल्ली-राजहरा में गुजरे बचपन के स्वादिष्ट अनुभवों में प्रथम स्थान तो माँ के हाथ के बने भोजन और पकवानों का ही आता है. उन दिनों आज की तरह होटल और बेकरीयों का इतना प्रचलन नहीं था. दल्ली में व्यतीत समय को सोचा जाए तो सबसे बड़ी खासियत यही याद आती है की उस समय बिना मिलावट की सब्जियों और दूध का स्वाद हमने चखा था. खेतों से ताज़ी निकली सब्जियों को टोकरे में रखकर बाई लोग गली-गली में चक्कर लगाकर बेचा करते थे. फूलगोभी उस ज़माने में शायद 25 पैसे की 1 मिलती थी. दूध लेने के लिए सर्कस मैदान के पास अत्तर सिंह अंकल के घर जाया करते थे. वहां हमारे नज़रों के सामने ही भैंस को दुहकर शुध्ध दूध लेते थे. उन दिनों मिलावट तो नहीं होती थी, मगर 1 लीटर दूध घर पहुँचते-पहुँचते झाग बैठ जाने के कारण सिर्फ पौना लीटर रह जाता था. फिर कुछ दिनों के बाद सोसाईटी का दूध हर चौक पे आने लगा. हास्पिटल सेक्टर में ये डब्बा-दूध रशियन कवार्टर के सामने आता था. उस दूध को खरीदने के लिए बड़ी धक्का-मुक्की और मशक्कत करनी पड़ती थी.

फिर याद आती है दल्ली के ताज़े फलों का स्वाद जो कि अलग-अलग मौसम में हम लोगों को नसीब होता था. स्ट्रीट नम्बर – 45 के हमारे क्वार्टर में आम, जाम (बाहरी दुनिया के लिए अमरुद), काजू , कटहल और सीताफल के पेड़ थे. मौसम में पेड़ों से तोड़-तोड़ के फलों को खाने का जो स्वाद था, वो फिर कहीं भी, कभी भी नसीब नहीं हुआ. बेर के मौसम में पेड़ों पे पत्थर मार-मार के कच्चे-पक्के बेरों को गिराकर खाने का जो आनंद था, वो अवर्णनीय है. बचपन में स्कूल के बाहर बाई लोग बेर बेचने को आते थे. तब 10 पैसे के 10 बेर मिलते थे. बेर को ही शायद चाशनी में डालकर एक अलग तरीके का बेर भी बेचा जाता था जो की गाढे रंग का होता था. वो शायद 10 पैसे का 4 आता था. बेर खरीदने के पश्चात बाई से बड़ी मिन्नतें की जाती थी जिसके बाद प्रसन्न होकर वो 1 बेर अलग से डाल देती थी. उस समय जो ख़ुशी मिलती थी वो ख़ुशी आजकल लाख रुपये कमा के भी नहीं मिलती. जामुन के मौसम में जी भर के जामुन खाकर कक्षा में एक-दुसरे को नीली जीभ दिखाया करते थे. दल्ली-राजहरा में बचपन में खायी हुई 2 ऐसी चीजें हैं जो फिर जीवन में कभी नहीं मिली. ये हैं तेंदू का फल और चना-बूट. फिर कभी दल्ली आना हुआ तो इन दोनों को चखने की बड़ी तमन्ना है.

स्कूल के दिनों में २ नम्बर स्कूल के बाहर मूंगफली के ठेले लगते थे. कभी जेब में मिठाइयाँ खरीदने के लिए 5-10 पैसे होते थे, कभी नहीं होते तो दूर से देख के ही मन को समझा लेते थे. नारंगी मिठाई 10 पैसे की 5 मिलती थी. इसके अलावा उन ठेलों में तरह-तरह की मिठाइयाँ, मूंगफली और बेर रहते थे. सभी ठेलेवालों में सबसे कड़क ठेलावाला मुच्छु हुआ करता था. मुच्छु ठेले में पकवानों के साथ-साथ एक डंडा भी रखता था. अगर बालक क्रय-विक्रय के दौरान अनुशासनहीनता का प्रदर्शन करे तो मुच्छु जी अपने डंडे से उनकी पीठ गरम कर देते थे. उन्ही दिनों मुच्छु जी के अन्याय से त्रस्त कुछ वरिष्ठ विद्यार्थियों ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला किया. होली के पिछले दिन शाला करीब 2 बजे छूट रही थी. सारे विद्यार्थी एक-दुसरे की कमीज़ पर स्याही छिड़कते हुए बाहर आ रहे थे. मुच्छु जी का भव्य ठेला शाला के सामने ही लगा था. अचानक 2 बन्दों ने ठेले से एक भरणी उठाकर एक दिशा में दौड़ लगा दी. मुच्छु जी अपनी लाठी निकालकर उनके पीछे दौड़ पड़े. उसके बाद खाली ठेले पर कम से कम 10-15 लोग टूट पड़े और क्षण भर में ठेले की सामग्रियाँ खाली हो गयी. इस घटना के दो परिणाम हुए. पहला तो ये कि मुच्छु ने लोगों को लाठी से पीटना छोड़ दिया , और दूसरा ये कि अब उनके साथ एक सहायक भी आने लगा.

गर्मी के दिनों में बर्फ के गोलेवाले का बड़ा इंतज़ार रहता था. कसम से कहता हूँ की जब तक दल्ली नहीं छोड़ा था, मैंने जीवन में आइस-क्रीम नहीं देखा था. विभिन्न रंगों से सज़ा हुआ बर्फ का गोला ही हमारा आइस-क्रीम था. और गुलाबी रंग के मुंह में घुल जाने वाली एक मिठाई के साथ एक भाई साब आते थे जिनकी “बॉम्बे – मिठाई” की पुकार मुंह के साथ-साथ कानों में भी रस घोल देती थी.

और अन्त में अगर होटलों की बात करे तो इसमें भी कई ना भूलने वाले स्वाद हैं. सबसे पहले तो बंगाल स्वीट्स का समोसा याद आता है. बचपन में महीने में एक बार बाल कटवाने के लिए पापा साइकिल पे बिठा के भानिलाल अंकल की दूकान पर लेके जाया करते थे. उस यात्रा की समाप्ति बंगाल मिष्ठान्न भण्डार के समोसों के साथ होती थी. समोसा खाते समय तेल में छनती हुई गरम-गरम जलेबियाँ का नज़ारा आज भी याद आता है. फिर थोड़े बड़े हुए तो नारायण के होटल का डोसा हमारी कमजोरी बन गया. मेरे ख़याल से उन दिनों पूरे दल्ली में दोसे की एक ही प्रमाणित दूकान थी. राजा-रंक, सभी जाति और धर्म के लोग नारायणजी के होटल का डोसा बड़े स्वाद से खाते थे. सर्दियों में जैन-भवन के पास चाट की दुकानें लगती थी. वहां जाकर प्लेट पे प्लेट गोलगप्पे और चाट खाने का जो मजा था वो बस अब यादों में ही है. 1986 के करीब आशा टाकीज़ के पास एक जलाराम स्वीट्स की दूकान खुली. वहां कचौड़ी में सेव, दही और इमली-पानी डालकर दिया जाता था. हमारी चटोरी जीभें तो उस स्वाद की ऐसी दीवानी थी कि ऐसी कोई शाम नहीं बीतती जब जलाराम की कचौड़ी नहीं खायी जाती.

अगर बचपन के स्वादों का वर्णन किया जाए तो शायद ये कहानी कभी ख़तम ही ना हो. जैसा की मैंने शुरू में ही कहा था कि बचपन के स्वादों में जीवन के विभिन्न अनुभवों की मिठास होती है. हर स्वाद के साथ एक दोस्त की याद लिपटी होती है. हर स्वाद एक लम्हे की याद दिलाता है जो हमने और सिर्फ हमने साथ गुजारे हैं. शायद इन्हीं यादों के स्वाद बचपन को इतने खूबसूरत बनाते हैं.


--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – 4)

  बुआ सर का एक्ज़ीक्यूटिव आर्डर   दौर था 1994 का | कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन में ये सवाल हमेशा के लिए सवाल बनकर रह गया कि ये एक्ज़ीक्यूटिव आ...