15 मार्च 2016

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 5) – बचपन के स्वाद

बचपन के स्वाद हमें जीवन भर याद रहते हैं. क्योंकि उस में स्वाद के साथ-साथ जीवन के विभिन्न अनुभवों की मिठास होती है. दल्ली-राजहरा में गुजरे बचपन के स्वादिष्ट अनुभवों में प्रथम स्थान तो माँ के हाथ के बने भोजन और पकवानों का ही आता है. उन दिनों आज की तरह होटल और बेकरीयों का इतना प्रचलन नहीं था. दल्ली में व्यतीत समय को सोचा जाए तो सबसे बड़ी खासियत यही याद आती है की उस समय बिना मिलावट की सब्जियों और दूध का स्वाद हमने चखा था. खेतों से ताज़ी निकली सब्जियों को टोकरे में रखकर बाई लोग गली-गली में चक्कर लगाकर बेचा करते थे. फूलगोभी उस ज़माने में शायद 25 पैसे की 1 मिलती थी. दूध लेने के लिए सर्कस मैदान के पास अत्तर सिंह अंकल के घर जाया करते थे. वहां हमारे नज़रों के सामने ही भैंस को दुहकर शुध्ध दूध लेते थे. उन दिनों मिलावट तो नहीं होती थी, मगर 1 लीटर दूध घर पहुँचते-पहुँचते झाग बैठ जाने के कारण सिर्फ पौना लीटर रह जाता था. फिर कुछ दिनों के बाद सोसाईटी का दूध हर चौक पे आने लगा. हास्पिटल सेक्टर में ये डब्बा-दूध रशियन कवार्टर के सामने आता था. उस दूध को खरीदने के लिए बड़ी धक्का-मुक्की और मशक्कत करनी पड़ती थी.

फिर याद आती है दल्ली के ताज़े फलों का स्वाद जो कि अलग-अलग मौसम में हम लोगों को नसीब होता था. स्ट्रीट नम्बर – 45 के हमारे क्वार्टर में आम, जाम (बाहरी दुनिया के लिए अमरुद), काजू , कटहल और सीताफल के पेड़ थे. मौसम में पेड़ों से तोड़-तोड़ के फलों को खाने का जो स्वाद था, वो फिर कहीं भी, कभी भी नसीब नहीं हुआ. बेर के मौसम में पेड़ों पे पत्थर मार-मार के कच्चे-पक्के बेरों को गिराकर खाने का जो आनंद था, वो अवर्णनीय है. बचपन में स्कूल के बाहर बाई लोग बेर बेचने को आते थे. तब 10 पैसे के 10 बेर मिलते थे. बेर को ही शायद चाशनी में डालकर एक अलग तरीके का बेर भी बेचा जाता था जो की गाढे रंग का होता था. वो शायद 10 पैसे का 4 आता था. बेर खरीदने के पश्चात बाई से बड़ी मिन्नतें की जाती थी जिसके बाद प्रसन्न होकर वो 1 बेर अलग से डाल देती थी. उस समय जो ख़ुशी मिलती थी वो ख़ुशी आजकल लाख रुपये कमा के भी नहीं मिलती. जामुन के मौसम में जी भर के जामुन खाकर कक्षा में एक-दुसरे को नीली जीभ दिखाया करते थे. दल्ली-राजहरा में बचपन में खायी हुई 2 ऐसी चीजें हैं जो फिर जीवन में कभी नहीं मिली. ये हैं तेंदू का फल और चना-बूट. फिर कभी दल्ली आना हुआ तो इन दोनों को चखने की बड़ी तमन्ना है.

स्कूल के दिनों में २ नम्बर स्कूल के बाहर मूंगफली के ठेले लगते थे. कभी जेब में मिठाइयाँ खरीदने के लिए 5-10 पैसे होते थे, कभी नहीं होते तो दूर से देख के ही मन को समझा लेते थे. नारंगी मिठाई 10 पैसे की 5 मिलती थी. इसके अलावा उन ठेलों में तरह-तरह की मिठाइयाँ, मूंगफली और बेर रहते थे. सभी ठेलेवालों में सबसे कड़क ठेलावाला मुच्छु हुआ करता था. मुच्छु ठेले में पकवानों के साथ-साथ एक डंडा भी रखता था. अगर बालक क्रय-विक्रय के दौरान अनुशासनहीनता का प्रदर्शन करे तो मुच्छु जी अपने डंडे से उनकी पीठ गरम कर देते थे. उन्ही दिनों मुच्छु जी के अन्याय से त्रस्त कुछ वरिष्ठ विद्यार्थियों ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला किया. होली के पिछले दिन शाला करीब 2 बजे छूट रही थी. सारे विद्यार्थी एक-दुसरे की कमीज़ पर स्याही छिड़कते हुए बाहर आ रहे थे. मुच्छु जी का भव्य ठेला शाला के सामने ही लगा था. अचानक 2 बन्दों ने ठेले से एक भरणी उठाकर एक दिशा में दौड़ लगा दी. मुच्छु जी अपनी लाठी निकालकर उनके पीछे दौड़ पड़े. उसके बाद खाली ठेले पर कम से कम 10-15 लोग टूट पड़े और क्षण भर में ठेले की सामग्रियाँ खाली हो गयी. इस घटना के दो परिणाम हुए. पहला तो ये कि मुच्छु ने लोगों को लाठी से पीटना छोड़ दिया , और दूसरा ये कि अब उनके साथ एक सहायक भी आने लगा.

गर्मी के दिनों में बर्फ के गोलेवाले का बड़ा इंतज़ार रहता था. कसम से कहता हूँ की जब तक दल्ली नहीं छोड़ा था, मैंने जीवन में आइस-क्रीम नहीं देखा था. विभिन्न रंगों से सज़ा हुआ बर्फ का गोला ही हमारा आइस-क्रीम था. और गुलाबी रंग के मुंह में घुल जाने वाली एक मिठाई के साथ एक भाई साब आते थे जिनकी “बॉम्बे – मिठाई” की पुकार मुंह के साथ-साथ कानों में भी रस घोल देती थी.

और अन्त में अगर होटलों की बात करे तो इसमें भी कई ना भूलने वाले स्वाद हैं. सबसे पहले तो बंगाल स्वीट्स का समोसा याद आता है. बचपन में महीने में एक बार बाल कटवाने के लिए पापा साइकिल पे बिठा के भानिलाल अंकल की दूकान पर लेके जाया करते थे. उस यात्रा की समाप्ति बंगाल मिष्ठान्न भण्डार के समोसों के साथ होती थी. समोसा खाते समय तेल में छनती हुई गरम-गरम जलेबियाँ का नज़ारा आज भी याद आता है. फिर थोड़े बड़े हुए तो नारायण के होटल का डोसा हमारी कमजोरी बन गया. मेरे ख़याल से उन दिनों पूरे दल्ली में दोसे की एक ही प्रमाणित दूकान थी. राजा-रंक, सभी जाति और धर्म के लोग नारायणजी के होटल का डोसा बड़े स्वाद से खाते थे. सर्दियों में जैन-भवन के पास चाट की दुकानें लगती थी. वहां जाकर प्लेट पे प्लेट गोलगप्पे और चाट खाने का जो मजा था वो बस अब यादों में ही है. 1986 के करीब आशा टाकीज़ के पास एक जलाराम स्वीट्स की दूकान खुली. वहां कचौड़ी में सेव, दही और इमली-पानी डालकर दिया जाता था. हमारी चटोरी जीभें तो उस स्वाद की ऐसी दीवानी थी कि ऐसी कोई शाम नहीं बीतती जब जलाराम की कचौड़ी नहीं खायी जाती.

अगर बचपन के स्वादों का वर्णन किया जाए तो शायद ये कहानी कभी ख़तम ही ना हो. जैसा की मैंने शुरू में ही कहा था कि बचपन के स्वादों में जीवन के विभिन्न अनुभवों की मिठास होती है. हर स्वाद के साथ एक दोस्त की याद लिपटी होती है. हर स्वाद एक लम्हे की याद दिलाता है जो हमने और सिर्फ हमने साथ गुजारे हैं. शायद इन्हीं यादों के स्वाद बचपन को इतने खूबसूरत बनाते हैं.


--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

07 जनवरी 2016

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 4) – फ़िल्में और हमारा बचपन

“भाइयों और बहनों, आशा टाकीज़ के शानदार परदे पर, आपके मनपसंद कलाकार अमिताभ बच्चन के साथ राखी और अमज़द खान को देखिये, फिल्म है बरसात की एक रात..........”. एक वक्त ऐसा भी था कि अमीन सायनी की तर्ज़ पर जब दल्ली-राजहरा के कृष्णा भैय्या रिक्शे पे बैठ के नए फिल्म की उद्घोषणा करते थे, तो सारा शहर रोमांचित हो उठता था. हर इंसान घर के बाहर आकर रिक्शे के दोनों तरफ लगे पोस्टर की एक झलक ले लेता था.

जी हाँ. हमारे बचपन में फिल्मों का बड़ा महत्व हुआ करता था. ये वो दिन थे जब टी. वी., वी.सी.आर. या इस तरह की किसी भी वायरस का हमारे जीवन में प्रवेश नहीं हुआ था. हमारा जीवन बड़ा ही स्वच्छ एवं निर्मल था. ऐसे वक्त में एकमात्र आशा टाकीज़ ही राजहरा निवासियों को फ़िल्मी दुनिया से बाँध के रखती थी.

आशा टाकीज़ में उन दिनों फिल्म देखना बड़ा ही मजेदार अनुभव हुआ करता था. हिट फिल्मों के टिकट निकालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी. जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, तब बाल्कनी 3 रुपये की टिकट हुआ करती थी. उसके पश्चात् कल्लू पहलवान टिकट फाड़कर सबको अन्दर बिठाते थे. फिल्म के साथ ही कई भाई लोग सिगरेट वगैरा का शौक फरमाने लगते थे. ये वो ज़माना था, जब कैंसर का इतना जोर नहीं था और सिगरेट पीना सच्चे मर्द की निशानी मानी जाती थी. उस दौर के दर्शकगण थिएटर में आगे की सीट पे पैर रखना और पान खा के अन्दर ही थूक देना अपना जन्मसिध्ध अधिकार समझते थे. आशा टाकीज़ के शानदार परदे पर (अनाउंसर कृष्णा भैय्या के लफ़्ज़ों में) हमने अपने जीवन के बेहतरीन फिल्मों को देखा है.

1984 के करीब रेल्वे पुल के पास महावीर टाकीज़ का प्रारम्भ हुआ जो की ओपन एयर थिएटर था. वहां सिर्फ 2 खेल ही हुआ करते थे. शाम को 6 बजे एवं रात को 9 बजे. बारिश के दिनों में फिल्म देखने का मजा ही कुछ और था. अगर फिल्म के बीच में बारिश हो जाए तो शो रद्द हो जाता था. अगले दिन उसी टिकट पे दुबारा फिल्म देखने का अवसर मिलता था. “हीरो” “शोले” जैसी कई ज़बरदस्त हिट फिल्मों को हमने इसी थिएटर में देखा था.

तीसरी जगह थी ऑफिसर्स क्लब के पास जो सिटिज़न क्लब था वहां पर मुखर्जी अंकल का 16 एम एम प्रोजेक्टर से ओपन एयर शो हुआ करता था. हर सप्ताह भिलाई से एक नयी फिल्म की रील आती थी और सप्ताह में दो दिन अप्पुन गरीब लोगन का वास्ते ओपन एयर शो होता था और एक दिन शायद ऑफिसर्स क्लब में साहेब लोगों के लिए शो हुआ करता था. जहाँ तक मेरी याद्दाश्त जाती है, मंगलवार और शनिवार को ये शो होते थे. मुखर्जी अंकल प्रोजेक्टर को लगाकर उसके बाजूवाली कुर्सी पे बैठते थे. फिल्म को क्लब की सफ़ेद दीवार पर चलाया जाता था. सारी जनता जमीन पे बैठकर फिल्म का लुत्फ़ उठाती थी. अगर किसी ने बदतमीज़ी या शोर शराबा किया तो अंकलजी शो को रोक के चिल्ला दिया करते थे. एक बार शोर-शराबे के चलते उन्होंने फिल्म ही बंद कर दी थी, जिसके पश्चात् फिर कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी. “हरियाली और रास्ता” , “अलाप” , “गंगा-जमुना” जैसी ना जाने दिल को छूनेवाली कितने ही फिल्मों का हमने वहाँ दर्शन किया था.

इसी दौरान, गणेश पूजा और दुर्गा पूजा के समय पर विभिन्न मंडलियों द्वारा फिल्म शो का आयोजन किया जाता था. हास्पिटल सेक्टर के मैदान में हर साल फिल्मों का प्रदर्शन आयोजित होता था. त्यौहार के मौके पर ज़मीन पर तिल धरने की जगह नहीं मिलती थी. ऐसे में हम बालकगण परदे के पीछे बैठकर चित्रपट का लुत्फ़ उठाते थे. कुछ छोटी-मोटी समस्याएं, जैसे कि फिल्म की हिरोइनी का साडी उलटी तरफ से खोसना, हीरो का बाल उलटी तरफ से काढना और हीरो का उलटे हाथ से पिस्तौल चलाना को हम अनदेखा कर दिया करते थे.

फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही कुछ फिल्मों का जिक्र भी इस कहानी में ज़रूरी है. 1975 के आस-पास एक फिल्म आई थी “जय संतोषी माँ”. उस फिल्म का गाना, “मैं तो आरती उतारूँ रे, संतोषी माता की” ने बरसों तक शहर के हर पूजा के पंडाल में धूम मचाई थी. “चल चमेली बाग़ में मेवा खिलाऊंगा”, “ढफलीवाले, ढफली बजा”, जैसे कर्णप्रिय गीत आज भी मन के किसी कोने में निरंतर बजते रहते हैं. 1981-82 में आई फिल्म “एक दूजे के लिए” ने सारे दल्ली-राजहरा को प्रेम रंग में रंग दिया था. सारी सड़कें, दीवारें, खम्भों पर सिर्फ एक ही नाम था...... “वासु + सपना, वासु + सपना”. मुझे यकीन है कि शायद इसी फिल्म ने दल्ली के जवान धडकनों में पहली बार प्रेम का रस घोला था. आज भी सच्चे प्यार की कसौटी में इस फिल्म की कोई टक्कर नहीं.

ये दौर था सन 1986 तक का. फिर हमारे ज़िन्दगी में टी.वी. आयी और रविवार की फिल्मों का जोर बढ़ने लगा. हास्पिटल सेक्टर के “मिनी रेडियो” दुकान वाले अंकल रविवार के दिन, एक टी.वी. बाहर की तरफ लगा देते थे. कसम से, ऐसी भीड़ होती थी कि पासवाले इस्त्री दुकान का बरामदा भी भर जाता था. फिर शहर में विडियो पार्लरों की भरमार हुई और 1989-90 तक केबल टी.वी. ने भी किसी ज़हरीले नाग की तरह हमारे जीवन को डस लिया. मिलकर फिल्मों को देखने की वो खुशियाँ गुम हो गयी, अब न कृष्णा भैय्या के अनाउंसमेंट होते थे और ना रिक्शों के पीछे भागकर पर्चे बटोरे जाते थे. अब हम अपने जीवन में उस “इडियट बॉक्स (टी.वी.)” के सामने सिमट के जीनेवाले इंसान बन गए. आज की पीढ़ी कभी भी इस बात का मतलब नहीं समझ पाएगी की टी.वी., केबल और डिश के पहले की दुनिया कैसी अनोखी थी. आज ब्लू-रे और UHD में फिल्म देखने वाले हम कभी किराए की वी.सी.आर. में घिसी हुई टेप डालकर घंटों की मेहनत के बाद फिल्मों को देखा करते थे. मुझे आज भी याद है कि बचपन में अमिताभ की फिल्म “दीवार” जब पहली बार आशा टाकीज़ में लगी थी तब किसी कारणवश देख नहीं पाया था, फिर दुबारा उस फिल्म को देखने के लिए मुझे 4 साल इंतज़ार करना पड़ा था.

ये दास्ताँ है 1968 – 1988 के बीच के उन अनोखे 20 साल की, जब तकनीक ने अपने पाँव फैलाने शुरू किये थे. तब, जब इंसान इंसानियत के बाशिंदे थे ना कि मशीनों के गुलाम. वो सुनहरी दुनिया जो अब कभी इस धरती पे लौट के नहीं आएगी.............................



--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

सर्वेयर की कहानियाँ (भाग – 4)

  बुआ सर का एक्ज़ीक्यूटिव आर्डर   दौर था 1994 का | कुछ ऐसा हुआ कि मेरे मन में ये सवाल हमेशा के लिए सवाल बनकर रह गया कि ये एक्ज़ीक्यूटिव आ...