बोंडे की आफत
*बोंडा*
बोंडा सर्विस का एक अहम्
भोज्य पदार्थ है. वी रेशन के लिए ये एक पत्नी की तरह है, यानी की उसका अधिकार है. और एस रेशन और
मौकाटेरियनों के लिए बोंडा एक पड़ोसन के जैसे ठहरी कि मौका मिले और हाथ मार लिए .
बोंडे के बगैर वी रेशन का भोजन अधूरा रह जाता था . एक बार बड़े खाने के दौरान हमने
एक जाट भाई को कुकड़े से लड़ते देखा . कह रहा था कि सारे डिश यहाँ क्यों नहीं
रखे. कुक बेचारा गिना रहा था कि पनीर है,
कोफ्ता है , मिक्स्ड वेजिटेबल है ..... मगर जाट भाई बोले कि “भई, बोंडा किधर है?”
खैर ये इस कहानी के पात्र का परिचय मात्र था
.
*मास्साब*
कहानी के दूसरे पात्र
मास्साब ठहरे . मास्साब से मेरी मुलाक़ात १९९४ के एक सुबह में हुई जब मैं SR-2 का
कोर्स करके सतलज में वापस आया. वो तब भी ठीक ऐसे ही दिखते थे जैसे आज दिखते हैं.
सतलज शिप्स कंपनी उन दिनों मास्साब के खौफ तले असहाय अवस्था में जी रही थी.
मास्साब की अगर पूरी कहानियों को टंकित किया जाय तो शायद बहुत बड़े उपन्यास के रचना
होने की संभावना है. फिर भी नयी पीढ़ी के लोगों को बता दूं कि मास्साब कितनी बड़ी
हस्ती थे आप उसका अनुमान भी नहीं लगा सकते. KGF फिल्म के रॉकी भाई भी अगर मास्साब
के रेंज में आते तो उसको भी प्लान्जे पे लटका के उससे बोथा मरवा देते . मास्साब के
पास हर समस्या का समाधान हुआ करता था. एक बार ओखा में 3 घंटे की कोशिश के बावजूद
भी कप्तान साब जहाज को जेट्टी पे ना लगा पाए, मास्साब ने बोशन स्टोर से टेक्कल
मंगवाया और टेक्कल के सहारे शिप को एलोंगसाइड लगवा दिया. वैसे बता दें कि टेक्कल
उनका प्रिय हथियार हुआ करता था. मास्साब इतने जुझारू प्रकृति के थे कि उन्होंने
सरेआम , सारी शिप्स कंपनी के सामने कप्तान लूकोस से अपने पैर छुवा के माफ़ी मांगने पे मजबूर किया था .
खैर वो सब कहानियाँ फिर कभी.
*मुख्य कथा*
कहानी घटित होती है सतलज
में. आम दिनचर्या के तहत मास्साब रोज सुबह बोथ्वाचेस में सबको कार्य सौंपने के बाद
पूरे जहाज का राउंड लेते थे . लेखक उन दिनों मास्साब के असिस्टेंट हुआ करते थे .
मास्साब आगे आगे चलते थे और हम जनाब के पीछे-पीछे कदम से कदम मिलाकर चला करते
थे. मास्साब का राउंड ठीक 10 बजकर 10
मिनिट पे शिप्स गैली में पहुँचा करता था .किंवदंतियों की मानी जाय तो इसी घटना के
कारण सभी घड़ियों का टाईम 10:10 पे रखा जाता है. स्टेंड इजी से 15 मिनिट पहले
पहुँचने वाले इस राउंड का उद्देश्य शिप्स कंपनी के भोजन के स्टैण्डर्ड को परखना
हुआ करता था. मास्साब के लिए दो गरमागरम बोंडे वहां स्टैंडबाई हुआ करते थे .
मास्साब खाते थे और चल पड़ते थे . बरसों से ये प्रथा चली आ रही थी , बे-रोक टोक,
निर्बाध.
एक दिन लोजिस्टिक
डिपार्टमेंट में एक मास्साब का आगमन हुआ. काले रंग के मास्साब केरला से थे और उनकी
नाक में एक मस्सा भी था . आते ही उन्होंने लोजिस्टिक डिपार्टमेंट का कंट्रोल अपने
हाथ में ले लिया.
घटना की वो सुबह अपने आप
में भीषण थी. आसमान में काले बादल छाए थे , शिप्स कंपनी मास्साब के निर्देशों के तहत
विभिन्न कार्यों में व्यस्त थी. ठीक 10 बजकर 10 मिनिट में मास्साब अपने चिर-परिचित
अंदाज़ में गैली में पहुँचे. लेखक उनके ठीक पीछे था. गैली में जैसे ही कुक ने बोंडे
को प्लेट पे रखे नए मास्टर चीफ कुक ने पुछा , “क्या कर रहे हो?” कुक डरता सहमता सा
बोला , “मास्साब के लिए बोंडा”. मास्टर चीफ कुक ने बोला , “कोई बोंडा – वोंडा नहीं
है. सर्विस रूल के हिसाब से चलने का “. अपने कुक को डफाराने के बाद मास्टर चीफ कुक
हमारे मास्साब को अनदेखा कर अपने काम में लग गए. अपमान की पराकाष्ठा थी. खून हमारा
इतना खौला कि मास्टर कुकड़े को उठा के पटक दे. लेकिन हमारे प्यारे मास्साब अविचलित
थे . ऐनक के ऊपर से उन्होंने सम्पूर्ण गैली का मुआयना किया , चुपचाप मुड़े और चल
पड़े.
मास्साब सीधा पहुँचे
एक्सो-साब के केबिन में. बदवार साब अपनी धुन में कुछ सोचते हुए बैठे थे. मास्साब
बोले ...
जय हिन्द सर.
जय हिन्द मासाब , क्या
हुआ ?
सर, लोजिस्टिक
डिपार्टमेंट का ड्रिल बहुत दिनों से नहीं हुआ है. करवाना था ज़रा .
ठीक है मास्साब, आप देख
लीजिये .
सधे क़दमों से मास्साब चल
पड़े गणर्स स्टोर की तरफ. लीडिंग सीमेन क्यू ए – 1 संजय जेन्वी वहां विराजमान थे.
डेली आर्डर बनाना उनका काम था . मास्साब ने आदेश दिया , कल फोर्टीन थर्टी
लोजिस्टिक डिपार्टमेंट का ड्रिल होगा . गणर्स योमेन के चेहरे पर हमने ख़ुशी की एक
झलक देखी. उस दिन के डेली ऑर्डर में ये आदेश भी आ गया.
1430 बड़े मजेदार चीज़ है.
एक चार तीन शून्य बोलो – कोई असर नहीं पड़ता . एक हज़ार चार सौ तीस बोलो – कोई फर्क
नहीं पड़ता है, और कुछ भी बोलो किसी को कोई फर्क ना पड़े. लेकिन अगर “फोर्टीन थर्टी
“ बोलो, जूनियर सेलरों के दिल दहल उठते
हैं.
अगले दिन मास्साब ने सब
कुछ किया मगर रूटीन के विपरीत गैली की तरफ नहीं गए. अगली दुपहरिया दिल को दहला
देनेवाली थी. कोचीन के साउथ जेट्टी में सतलज लोजिस्टिक के जूनियर सेलरों की बहुत
ही खतरनाक ड्रिल ली गयी. सीनियर सेलरों को एक पंक्ति में सावधान खड़ा किया गया
कड़कती धूप में. नाक में मस्से वाले मास्टर चीफ भी उस कतार में थे. उनका काला चेहरा
धूप या अपमान से और भी काला हो चला था. 1430 से 1525 तक ड्रिल चली . बन्दों का
नंबर 10 पूरा पानी-पानी हो चला तब जाकर सेक्योर हुआ.
सुना है उस रात गैली में
घमासान हुआ . कुकड़ों ने मास्टर चीफ (नाक में मस्सा वाले) को घेर के खूब गाली दिया.
बोले कि ज्यादा नौटंकी किया तो पानी में फेंक देंगे. ऑफिसर कुक और स्टीवर्ड भी इस
युद्ध में शामिल हुए .
अगली सुबह बहुत ही शांत
और सुन्दर थी. खिला हुआ सूरज और पक्षियों की चहचहाहट दिन को और खूबसूरत बना रही
थी. सबको काम पे लगाने के बाद ठीक 10 बजकर 10 मिनिट पर मास्साब गैली पहुँचे. उनका
2 बोंडा थाली में भाप के साथ एकदम तैयार
था . आज नाक में मस्सा वाले मास्टर कुकड़े साब हांड़ी में कडछा चलाने में व्यस्त थे
. इतनी आहटों के बावजूद भी उनका ध्यान हांडी से बिलकुल नहीं हटा. मास्साब ने
इत्मीनान से बोंडा खाया और साढ़े क़दमों से चल पड़े.
इतिहास गवाह है की सतलज
के चरित्र में मास्साब के बोंडे पे हाथ डालने की जुर्रत फिर कभी किसी ने ना दिखाई.
(कथा समाप्त)
यूँ तो इस कथा में हास्य
के बहुत तत्व हैं. मगर हमारी पीढ़ी अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझती है कि हमें
मास्साब जैसे मार्गदर्शक मिले. जीवन में कठिन-कठिन परिस्थितियों में मास्साब की
सीख और उनके जुझारूपने व्यक्तित्व से मिली प्रेरणा ने आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान
की. तहे दिल से आपका शुक्रिया है.
आज मास्साब की तबियत कुछ
खराब चल रही है. पिछले दिनों उन्होंने मुझे सन्देश भेजा कि, ‘जिम्मी, मैं लॉन्ग
रीफिट के लिए ड्राई डोक होने जा रहा हूँ”. हमने भी कहा कि, “सर बहुत जल्दी आप फिर
सेलिंग करने लगोगे.” हम सब आपको मिस कर रहे हैं. सुबह कितने भी बजे उठो, आपका गुड
मोर्निंग पहले ही पहुँचा रहता है. फिर से इंतज़ार है उन दिनों का .......
GET WELL SOON SIR.
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