दल्ली राजहरा का जिक्र हो और वहां के फुटबाल मैचों के बारे में दो शब्द न कहा जाए तो वर्णन अधूरा रह जाएगा. 1980 के दशक में दल्ली का फुटबॉल टुर्नामेंट अपनी चरम अवस्था में था. एक ऐसे शहर में जहाँ तब तक मनोरंजन का साधन सिर्फ आशा टाकीज़ में आनेवाली फ़िल्में और दशहरे को होनेवाली रामलीला थी, वार्षिक आयरन ऑर गोल्ड कप फुटबाल टूर्नामेंट का हर किसी को बेसब्री से इंतज़ार रहता था. सर्दियों के दिनों में होनेवाली उस खेल प्रतियोगिता का दल्लीवासियों के जीवन में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान था.
टूर्नामेन्ट की तैयारी काफी दिन पहले से ही चालु हो जाया करती थी. मैचों का आयोजन हाई-स्कूल सेक्टर में स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम में किया जाता था. टूर्नामेंट की घोषणा होने के पश्चात मैच के तारीखों और टीमों की घोषणा करने वाले लाल-पीले-नीले पर्चे सारे शहर में बांटे जाते थे. हम बच्चों की टोली रिक्शा के पीछे भाग-भाग के ज्यादा से ज्यादा पर्चे बटोरा करते थे. सभी शालाओं में बच्चों को कम कीमत में फुटबाल के टूर्नामेंट पास वितरित करने की व्यवस्था की गयी थी. ये प्रतियोगिता लगभग 15-20 दिन चला करती थी. उन दिनों कक्षाएँ सिर्फ 3-4 घन्टे की होती थी. दोपहर के भोजन के पश्चात् तकरीबन सारा शहर फुटबाल ग्राउंड में आ जाया करता था.
फुटबाल मैदान के सामने तीन मंज़िल की इमारतें हुआ करती थी जिन्हें “तीन-तल्ला” मकान कहा करते थे. उन मकानों के छत मैच के दौरान बिना टिकट दर्शकों से भर जाया करते थे. कुल मिलाकर तीन तरह के टिकट दिए जाते थे, एक कुर्सीवाले टिकट, फिर गैलरी वाले टिकट और फिर ग्राउंड टिकट. टूर्नामेंट पास में 1 से 30 तक नम्बर हुआ करते थे, गेट पे रहनेवाले अंकलजी उस पास को लेकर उस दिन को पंचिंग मशीन से छेद दिया करते थे. मैदान में घुसने के बाद फिर निकलने तक उत्सव का माहौल रहता था.
भारत की लगभग सभी बड़ी टीमें इस प्रतियोगिता में भाग लिया करती थी. मुहम्मडन स्पोर्टिंग, जे.सी.टी. फगवाड़ा, प्रीमियर टायर केरला, बी.एस.एफ. जालंधर इत्यादि टीमों ने हमारे शहर में फ़ुटबाल खेला है. लेकिन सबसे बड़ा आकर्षण तो हमारी दल्ली की टीम ही थी. उन दिनों जिलानी उस्ताद के नेतृत्व में नायडू भैय्या, रूबी डेविड भैय्या, प्रेम नायर भैय्या वगैरा हमारे शहर के स्टार हुआ करते थे. जिस दिन दल्ली टीम का मैच होता था, उस दिन मैदान में तिल धरने की जगह नहीं मिलती थी. जहाँ तक मेरी याद्दाश्त जाती है, 1982 में दल्ली की टीम ने टूर्नामेंट का फाइनल मैच खेला था. सेमी-फाइनल के दौरान मैच के समाप्ति तक स्कोर 0-0 था. मैच अतिरिक्त समय में खेला जाने लगा. उस समय जिलानी उस्ताद दल्ली टीम के प्लेयर कम कोच हुआ करते थे. मैच के आखिरी दस मिनट में जिलानी उस्ताद मैदान में आये. मैच ख़तम होने के 5 मिनट पहले दल्ली टीम को एक कोर्नर किक मिला. जिलानी उस्ताद खुद उस किक को लेने मैदान में उतरे. दस साल की उम्र में पहली बार मैंने जीवन में चमत्कार देखा था. जिलानी उस्ताद द्वारा लिया गया अर्धवृत्ताकार किक 7 – 8 लोगों के ऊपर से गुज़रता हुआ सीधे गोल में घुस गया. बरसों बाद ब्राज़ील के खिलाडी रोबेर्टो कार्लोस (जो आजकल दिल्ली डायनामो के खिलाडी हैं) को वर्ल्ड-कप में ऐसा चकरी-किक मारते देख उस्ताद की याद फिर से ताज़ा हो गयी थी. मुझे पूरा यकीन है कि उस मैच को देखनेवाला कोई भी दल्लीवासी उस किक को जीवन भर भूल नहीं सकता. अगले दिन दल्ली की टीम फाइनल मैच हार गयी, लेकिन फिर भी हमारे शहर के खिलाड़ी सभी के आँखों के तारे बने रहे. बाद में भी इस कहानी को आगे बढानेवाले विल्सन भैय्या, कान्चा भैय्या और निर्मल इत्यादि काफी अच्छे खिलाडियों ने दल्ली का नाम खूब रोशन किया.
और आखिरी में एक बात और, फ़ुटबाल मैच की बात हो और बाबु मोशाय का जिक्र ना हो तो ये सरासर अन्याय होगा. मुहम्मडन स्पोर्टिंग की टीम के साथ मिठाई बेचनेवाले एक बंगाली बाबु आया करते थे. “लेमन चुस्स्स्स..........” की पुकार से उनके इर्द-गिर्द बच्चों का मेला लग जाया करता था. बाबूजी बड़ी महँगी मिठाइयाँ बेचा करते थे (उन दिनों 5 पैसों में एक मिठाई या टॉफ़ी मिला करती थी. लेकिन बाबु मोशाय 1 रुपये में 5 मिठाई दिया करते थे. जो कि हमारे हिसाब से काफी महँगी थी) smile emoticonsmile emoticonsmile emoticon
कांच की भरणी में रखी मिठाइयाँ लाल, हरे, नारंगी और काले रंग की हुआ करती थी. उसमें से काली मिठाई बड़ी स्वादिष्ट हुआ करती थी. इमली की खटास और मिठास मिलकर एक अजीब सा स्वाद उस मिठाई में आता था. बच्चे या बड़े, नर या नारी हर कोई बाबु मोशाय के पीछे पड़ जाता और कहता, “काला वाला दो, काला वाला”, और बाबु मोशाय बड़ी सफाई से 5 में 1 काली मिठाई डालते थे. अगर गलती से किसी को 5 में 2 काली मिठाई मिल जाए तो वो अपने आप को प्रधानमन्त्री से कम नहीं समझता था. और पलक झपकते ही “लेमन चुस्स्स्स, बाबू चुस्स्स्स.......” की पुकार के साथ हमारे बाबु मोशाय काफी दूर निकल जाते थे. फिर उन मिठाइयों के लिए अगले दिन तक इंतज़ार करना पड़ता था, और टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद अगले साल तक इंतज़ार करना पड़ता था.
वक्त अपने धीमे क़दमों से चलता हुआ ना जाने कितने सावन पार कर गया. समय की लहरों ने उस छोटे शहर से निकालकर दुनियां के बड़े-बड़े शहरों में घुमने का अवसर प्रदान किया. जीवन में फिर हजारों तरह की मिठाइयाँ खायी मगर उस जैसा स्वाद फिर कहीं नहीं मिला. मिठाइयों के बड़े-बड़े दुकानों में आज भी नज़रें उस कालीवाली मिठाई को ढूंढती है, और दिल चाहता है कि वो पुकार फिर से सुनाई दे, “लेमन चुस्स्स्स...........................”.
--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.
कांच की भरणी में रखी मिठाइयाँ लाल, हरे, नारंगी और काले रंग की हुआ करती थी. उसमें से काली मिठाई बड़ी स्वादिष्ट हुआ करती थी. इमली की खटास और मिठास मिलकर एक अजीब सा स्वाद उस मिठाई में आता था. बच्चे या बड़े, नर या नारी हर कोई बाबु मोशाय के पीछे पड़ जाता और कहता, “काला वाला दो, काला वाला”, और बाबु मोशाय बड़ी सफाई से 5 में 1 काली मिठाई डालते थे. अगर गलती से किसी को 5 में 2 काली मिठाई मिल जाए तो वो अपने आप को प्रधानमन्त्री से कम नहीं समझता था. और पलक झपकते ही “लेमन चुस्स्स्स, बाबू चुस्स्स्स.......” की पुकार के साथ हमारे बाबु मोशाय काफी दूर निकल जाते थे. फिर उन मिठाइयों के लिए अगले दिन तक इंतज़ार करना पड़ता था, और टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद अगले साल तक इंतज़ार करना पड़ता था.