07 जनवरी 2016

दल्ली-राजहरा – मेरी यादों में (भाग – 4) – फ़िल्में और हमारा बचपन

“भाइयों और बहनों, आशा टाकीज़ के शानदार परदे पर, आपके मनपसंद कलाकार अमिताभ बच्चन के साथ राखी और अमज़द खान को देखिये, फिल्म है बरसात की एक रात..........”. एक वक्त ऐसा भी था कि अमीन सायनी की तर्ज़ पर जब दल्ली-राजहरा के कृष्णा भैय्या रिक्शे पे बैठ के नए फिल्म की उद्घोषणा करते थे, तो सारा शहर रोमांचित हो उठता था. हर इंसान घर के बाहर आकर रिक्शे के दोनों तरफ लगे पोस्टर की एक झलक ले लेता था.

जी हाँ. हमारे बचपन में फिल्मों का बड़ा महत्व हुआ करता था. ये वो दिन थे जब टी. वी., वी.सी.आर. या इस तरह की किसी भी वायरस का हमारे जीवन में प्रवेश नहीं हुआ था. हमारा जीवन बड़ा ही स्वच्छ एवं निर्मल था. ऐसे वक्त में एकमात्र आशा टाकीज़ ही राजहरा निवासियों को फ़िल्मी दुनिया से बाँध के रखती थी.

आशा टाकीज़ में उन दिनों फिल्म देखना बड़ा ही मजेदार अनुभव हुआ करता था. हिट फिल्मों के टिकट निकालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी. जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, तब बाल्कनी 3 रुपये की टिकट हुआ करती थी. उसके पश्चात् कल्लू पहलवान टिकट फाड़कर सबको अन्दर बिठाते थे. फिल्म के साथ ही कई भाई लोग सिगरेट वगैरा का शौक फरमाने लगते थे. ये वो ज़माना था, जब कैंसर का इतना जोर नहीं था और सिगरेट पीना सच्चे मर्द की निशानी मानी जाती थी. उस दौर के दर्शकगण थिएटर में आगे की सीट पे पैर रखना और पान खा के अन्दर ही थूक देना अपना जन्मसिध्ध अधिकार समझते थे. आशा टाकीज़ के शानदार परदे पर (अनाउंसर कृष्णा भैय्या के लफ़्ज़ों में) हमने अपने जीवन के बेहतरीन फिल्मों को देखा है.

1984 के करीब रेल्वे पुल के पास महावीर टाकीज़ का प्रारम्भ हुआ जो की ओपन एयर थिएटर था. वहां सिर्फ 2 खेल ही हुआ करते थे. शाम को 6 बजे एवं रात को 9 बजे. बारिश के दिनों में फिल्म देखने का मजा ही कुछ और था. अगर फिल्म के बीच में बारिश हो जाए तो शो रद्द हो जाता था. अगले दिन उसी टिकट पे दुबारा फिल्म देखने का अवसर मिलता था. “हीरो” “शोले” जैसी कई ज़बरदस्त हिट फिल्मों को हमने इसी थिएटर में देखा था.

तीसरी जगह थी ऑफिसर्स क्लब के पास जो सिटिज़न क्लब था वहां पर मुखर्जी अंकल का 16 एम एम प्रोजेक्टर से ओपन एयर शो हुआ करता था. हर सप्ताह भिलाई से एक नयी फिल्म की रील आती थी और सप्ताह में दो दिन अप्पुन गरीब लोगन का वास्ते ओपन एयर शो होता था और एक दिन शायद ऑफिसर्स क्लब में साहेब लोगों के लिए शो हुआ करता था. जहाँ तक मेरी याद्दाश्त जाती है, मंगलवार और शनिवार को ये शो होते थे. मुखर्जी अंकल प्रोजेक्टर को लगाकर उसके बाजूवाली कुर्सी पे बैठते थे. फिल्म को क्लब की सफ़ेद दीवार पर चलाया जाता था. सारी जनता जमीन पे बैठकर फिल्म का लुत्फ़ उठाती थी. अगर किसी ने बदतमीज़ी या शोर शराबा किया तो अंकलजी शो को रोक के चिल्ला दिया करते थे. एक बार शोर-शराबे के चलते उन्होंने फिल्म ही बंद कर दी थी, जिसके पश्चात् फिर कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी. “हरियाली और रास्ता” , “अलाप” , “गंगा-जमुना” जैसी ना जाने दिल को छूनेवाली कितने ही फिल्मों का हमने वहाँ दर्शन किया था.

इसी दौरान, गणेश पूजा और दुर्गा पूजा के समय पर विभिन्न मंडलियों द्वारा फिल्म शो का आयोजन किया जाता था. हास्पिटल सेक्टर के मैदान में हर साल फिल्मों का प्रदर्शन आयोजित होता था. त्यौहार के मौके पर ज़मीन पर तिल धरने की जगह नहीं मिलती थी. ऐसे में हम बालकगण परदे के पीछे बैठकर चित्रपट का लुत्फ़ उठाते थे. कुछ छोटी-मोटी समस्याएं, जैसे कि फिल्म की हिरोइनी का साडी उलटी तरफ से खोसना, हीरो का बाल उलटी तरफ से काढना और हीरो का उलटे हाथ से पिस्तौल चलाना को हम अनदेखा कर दिया करते थे.

फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही कुछ फिल्मों का जिक्र भी इस कहानी में ज़रूरी है. 1975 के आस-पास एक फिल्म आई थी “जय संतोषी माँ”. उस फिल्म का गाना, “मैं तो आरती उतारूँ रे, संतोषी माता की” ने बरसों तक शहर के हर पूजा के पंडाल में धूम मचाई थी. “चल चमेली बाग़ में मेवा खिलाऊंगा”, “ढफलीवाले, ढफली बजा”, जैसे कर्णप्रिय गीत आज भी मन के किसी कोने में निरंतर बजते रहते हैं. 1981-82 में आई फिल्म “एक दूजे के लिए” ने सारे दल्ली-राजहरा को प्रेम रंग में रंग दिया था. सारी सड़कें, दीवारें, खम्भों पर सिर्फ एक ही नाम था...... “वासु + सपना, वासु + सपना”. मुझे यकीन है कि शायद इसी फिल्म ने दल्ली के जवान धडकनों में पहली बार प्रेम का रस घोला था. आज भी सच्चे प्यार की कसौटी में इस फिल्म की कोई टक्कर नहीं.

ये दौर था सन 1986 तक का. फिर हमारे ज़िन्दगी में टी.वी. आयी और रविवार की फिल्मों का जोर बढ़ने लगा. हास्पिटल सेक्टर के “मिनी रेडियो” दुकान वाले अंकल रविवार के दिन, एक टी.वी. बाहर की तरफ लगा देते थे. कसम से, ऐसी भीड़ होती थी कि पासवाले इस्त्री दुकान का बरामदा भी भर जाता था. फिर शहर में विडियो पार्लरों की भरमार हुई और 1989-90 तक केबल टी.वी. ने भी किसी ज़हरीले नाग की तरह हमारे जीवन को डस लिया. मिलकर फिल्मों को देखने की वो खुशियाँ गुम हो गयी, अब न कृष्णा भैय्या के अनाउंसमेंट होते थे और ना रिक्शों के पीछे भागकर पर्चे बटोरे जाते थे. अब हम अपने जीवन में उस “इडियट बॉक्स (टी.वी.)” के सामने सिमट के जीनेवाले इंसान बन गए. आज की पीढ़ी कभी भी इस बात का मतलब नहीं समझ पाएगी की टी.वी., केबल और डिश के पहले की दुनिया कैसी अनोखी थी. आज ब्लू-रे और UHD में फिल्म देखने वाले हम कभी किराए की वी.सी.आर. में घिसी हुई टेप डालकर घंटों की मेहनत के बाद फिल्मों को देखा करते थे. मुझे आज भी याद है कि बचपन में अमिताभ की फिल्म “दीवार” जब पहली बार आशा टाकीज़ में लगी थी तब किसी कारणवश देख नहीं पाया था, फिर दुबारा उस फिल्म को देखने के लिए मुझे 4 साल इंतज़ार करना पड़ा था.

ये दास्ताँ है 1968 – 1988 के बीच के उन अनोखे 20 साल की, जब तकनीक ने अपने पाँव फैलाने शुरू किये थे. तब, जब इंसान इंसानियत के बाशिंदे थे ना कि मशीनों के गुलाम. वो सुनहरी दुनिया जो अब कभी इस धरती पे लौट के नहीं आएगी.............................



--------- दल्ली-राजहरा के सभी प्रिय साथियों को समर्पित.

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